चंद्रगुप्त मौर्य का इतिहास
मौर्य साम्राज्य का भारत के इतिहास में विशेष महत्व है । इस वंश के उदय के साथ ही भारत के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास में नव युग का प्रारंभ होता है ।
मौर्य वंश के प्रादुर्भाव से जहां भारत में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना होती है वही निश्चित तिथि क्रम में भी ज्ञात होना प्रारंभ हो जाता है चंद्रगुप्त मौर्य के सिंहासरोहण की तिथि भारतीय इतिहास के काल क्रम में एक ज्योतिर्मय स्तंभ है। मौर्य काल में जहां भारत में सुसंगठित शासन - व्यवस्था की स्थापना हुई और शासन में एकरूपता आई। मौर्य शासन की स्थापना से भारत में विदेशी सत्ता का अंत हो गया।
इतिहासकार स्मिथ का कथन है कि मौर्य वंश का प्रादुर्भाव "इतिहासकारों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है ।"
मौर्य काल के जानकारी के स्रोत
मौर्य काल की जानकारी हमें साहित्यिक एवं पुरातात्विक दोनों साधनों से प्राप्त होती है। इन साधनों से हमें उस काल की राजनीतिक आर्थिक प्रशासनिक एवं सामाजिक अवस्था की जानकारी मिलती है। साहित्यिक साधनों को अध्ययन की सुविधा के लिए दो भागों में बांटा गया है :- देसी साहित्य एवं विदेशी साहित्य
साहित्यिक सामग्री
देशी साहित्य : अर्थशास्त्र : कौटिल्य का अर्थशास्त्र चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की हर पहलू पे प्रकाश डालता है। यह उस काल के अध्ययन की एक महत्वपूर्ण साधन है। इसके 15 अधिकरण और 180 प्रकरण से हमें उस काल की शासन व्यवस्था, भू -व्यवस्था , वित्तीय पद्धति उस काल के कानून तथा समाज व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
मुद्राराक्षस: विशाख दत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त एवं कौटिल्य द्वारा नंद वंश के विनाश की पूरी जानकारी मिलती है। साथ ही यह ग्रंथ तत्कालीन सभ्यता और संस्कृति का पूर्ण परिचय देता है ।
पुराण : विष्णु पुराण से भी हमें चंद्रगुप्त के बारे में पता चलता है। साथ ही पाणिनी की अष्टाध्यायी , पतंजलि का महाभाष्य भी मौर्य काल की जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है । वही सोमदेव के कथासरित्सागर और क्षेमेंद्र की बृहत्कथामंजरी भी मौर्य वंश की जानकारी देता है ।
बौद्ध साहित्य : दीपवंश , महावशं , दिव्यावदान , अशोकावदान , मंजुश्रीमूलकल्प , आदि ग्रंथों से न केवल मौर्य वंश के शासकों की जानकारी मिलती है बल्कि उनके कुल के निर्धारण में भी सहायता मिलती है। बौद्ध ग्रंथ अशोक के प्रारंभिक जीवन कर उसके हृदय परिवर्तन, उसके द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने के साथ ही उसके द्वारा धर्म के प्रचार प्रसार में प्रश्रय देने की बात भी बताती है।
जैन साहित्य :परिशिष्ट वर्तन तथा कल्पसूत्र जैसे जैन साहित्य मौर्य कालीन इतिहास की जानकारी प्रदान करने में अपना विशेष महत्व रखते हैं।
तमिल साहित्य :तमिल लेखक ममुलनार और परणार के विवरणो से हमें चन्द्रगुप्त के दक्षिण में साम्राज्य विस्तार की जानकारी मिलती है।
विदेशियों के यात्रा - विवरण : उपरोक्त देश सहित्यिक सामाग्रियो के अतिरिक्त यूनानी एवं चीनी यात्रियो के वृतांतो से भी हमें मौर्य कालीन इतिहास एवं संस्कृति की जानकारी मिलती है।
विशेष रुप मेगास्थनीज द्वारा रचित पुस्तक 'इंडिका' से हमें उस काल की राज्य प्रबंध, सैनिक प्रशासन, स्थानीय शासन और शासक के निजी जीवन के बारे में पता चलता है।
वहीं चीनी यात्रियों फाहियान और हवेनसांगके यात्रा वितांत में भी उस कालक्रम को जानकारी के महत्वपूर्ण स्रोत उपलब्ध है ।
पुरातात्विक स्रोत : अशोक ने राजाज्ञायो को शिलालेखों पर खुदवाकर जनता के समक्ष प्रस्तुत किया। इन अभिलेखों में प्राकृत भाषा एवं ब्राही लिपि का प्रयोग किया गया है।
वहीं कुछ अभिलेखों में खरोष्ठी, आरमेयी एवं यूनानी लिपि का भी प्रयोग किया गया है।
इस काल की जानकारी हमें जूनागढ़ के शक शासक रुद्रदामन के अभिलेखों से भी पता चलता है।
इस काल में आहत् सिक्कें पाए गए हैं। जिससे इस काल की समृद्ध आर्थिक स्थिति की जानकारी मिलती है ।
मौर्यो की उत्पति
मौर्यो की उत्पति के संबध मे विद्वानों में म्तभेद है जहां ब्राह्मण ग्रंथों में मौर्यो को शुद्र कहा गया है, वहीं बोद्ध ग्रन्थ में उन्हें क्षत्रिय बतलाया है।
जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य को सेन्ड्रोकोट्रटस कहा है। जिसकी पहचान विलियम जोन्स ने चन्द्रगुप्त मौर्य से की है।
विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए वृषल अर्थात् निम्न कूल मे उत्पन्न बताया गया है ।
चन्द्रगुप्त मौर्य
(322 ई० पू० - 297 ई० पू०)
चंद्रगुप्त मौर्य मौर्य-साम्राज्य का संस्थापक था । वह एक कुशल सेनानी, सफल विजेता और एक महान शासक था। उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की और भारतीय राज्य की सीमा को उसके प्राकृतिक सीमा के बाहर तक फैलाया ।
चंद्रगुप्त के प्रारंभिक जीवन के विषय में विश्वसनीय जानकारी बहुत कम ही उपलब्ध है। जहां बौद्ध साहित्य में उसे मोरिय राजा का पुत्र बतलाया गया है । वहीं ब्राह्मण ग्रंथ में उसे शूद्र बतलाया गया है । चंद्रगुप्त मौर्य के माता-पिता के बारे में ठीक से ज्ञात नहीं है। 'महावंशिका' से उसके पिता को मोरिय जाति का प्रधान बताया गया है जो किसी संघर्ष में मारा गया था । पति की मृत्यु के बाद उसकी माता अज्ञात रूप से पाटलिपुत्र में रहने लगी । माना जाता है कि यही चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म हुआ। इस प्रकार पहले ग्वाले ने और बाद में शिकारियों ने उसका लालन-पालन किया था। उसका बचपन मयूर-पालको ,चरवाहों और शिकारियों के बीच बीता ।
चंद्रगुप्त मौर्य प्रारंभ से ही एक प्रतिभाशाली बालक था। एक किंवदंती के अनुसार वह एक दिन 'राजकीय खेल 'खेल रहा था। जिसमें वह राजा बना था और अपने साथियों को अन्य पद दिए थे और उनके सहयोग से कुछ अभियुक्तों का न्याय करने लगा यह सब दूर खड़ा चाणक्य देख रहा था और उसके कार्य कुशलता से वह बहुत प्रभावित हुआ इसी वजह से उसने उसे शिकारियों से ₹1000 में खरीद लिया ।
बाद में वह चंद्रगुप्त को तक्षशिला ले गया जहां उसे शिक्षा - दीक्षा देकर एक कुशल योद्धा बनाया। कालांतर में चंद्रगुप्त के द्वारा नंद वंश का विनाश करवाकर उसे मगध का राजा बनाया ।
विजय अभियान
चाणक्य और चंद्रगुप्त के योग ने भारतीय इतिहास को एक नवीन दिशा दी 'चंद्रगुप्त में जहां सहज प्रतिभा और महत्वाकांक्षा थी ,वहीं चाणक्य विविध विधाओं का पंडित एवं प्रगाढ़ कूटनीतिज्ञ था। बल और बुद्धि के इस अनोखे मेल ने किसी भी विरोधी शक्ति का सफलतापूर्वक सामना किया। इनके सम्मिलित प्रयासों से जहां पश्चिम भारत आक्रान्त विदेशियों से स्वतंत्र हुई वहीं आततायी नंद वंश का विनाश कर एक स्वर्णिम युग का आरंभ किया ।
चन्द्रगुप्त का मगध पर आक्रमण
चंद्रगुप्त मौर्य चाणक्य का प्रथम मगध आक्रमण असफल रहा था। कारण था नंदो की शक्ति ।
प्रथम असफलता के बाद चंद्रगुप्त ने अपने राजनीतिक भूल को सुधारने का प्रयास किया और पूरी तरह योजनाबद्ध तरीके से पुन ! मगध पर आक्रमण किया। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए चाणकय ने पर्वतीय प्रांत के राजा प्रवर्तक के साथ एक राजनीतिक संधि की। इधर चंद्रगुप्त की सेना में पंजाब, गंधार, कंबोज, किरात पारसीक शक और यवन की एक संयुक्त विशाल सेना सम्मिलित थी । इस विशाल सेना के साथ चंद्रगुप्त ने मगध की ओर प्रस्थान किया। विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में धनानंद और चंद्रगुप्त के युद्ध का वर्णन है।चंद्रगुप्त और धनानंद के बीच हुए युद्ध का वर्णन पौराणिक जैन बौद्ध साहित्य ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है। दोनों सेनाओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ जिसमें चंद्रगुप्त की विजय हुई , धनानंद की सपरिवार हत्या कर दी गई। इस प्रकार धनानंद का राज्य समाप्त हो गया। धनानंद को समाप्त कर चंद्रगुप्त चाणक्य की मदद से मगध का राजा बना। उसके सिंहासनारुढ़ होने की तिथि में भी अंतर था। परंतु स्थूल रूप से कहा जा सकता हैं कि 323 ई० पूर्व और 321 ई॰ पू० के मध्य वह सिहासनारूढ़ हुआ।
चंद्रगुप्त ने सिंघासनासीन होने के बाद साम्राज्य के विस्तार के ओर ध्यान दिया । प्लूटार्क के अनुसार इस विजय अभियान के लिए उसने छह लाख से अधिक सेना एकत्रित की थी। मुद्राराक्षस के विवरण से पता चलता है कि चंद्रगुप्त ने शैलेंद्र हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र तक के सभी राजाओं का आश्रय दाता बन गया था । चाणक्य और चंद्रगुप्त के संयुक्त प्रयास का ही फल था कि पहली बार हिंदूकुश और हिमालय से लेकर पूर्व में बंगाल पश्चिम में सौराष्ट्र और विंध्याचल के पार मैसूर तक भारतीय राज्यों की सीमाएं फैल गई ।
चंद्रगुप्त ने लगभग 305 में सैल्यूकस निकेटर को हराया। युद्ध में पराजित होने के बाद सैल्यूकस ने युद्ध के संधि शर्तों के अनुसार 500 हाथी उपहार में लेकर बदले में पूर्वी अफगानिस्तान बलूचिस्तान और सिंधु नदी के पश्चिम का क्षेत्र उसे दे दिया था।
साथ ही सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री कार्नेलिया की शादी चंद्रगुप्त मौर्य के साथ कर दी। चन्द्रगुप्त ने अपना अंतिम समय कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया था। वृद्धावस्था में चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन मुनि भद्रबाहु से जैन दिक्षा ली थी और श्रवणबेलगोला में 297 ई० पू० में उपवास द्वारा अपना शरीर त्याग दिया था। जिस पहाड़ी पर उसने अपना अंतिम समय व्यतीत किया था उसे चन्द्रगिरि पुकारते हैं और वहीं उसके द्वारा बनवाया चंद्रगुप्तवस्ती नामक मंदिर भी है ।
चंद्रगुप्त मौर्य का प्रशासन
चंद्रगुप्त मौर्य एक महान विजेता और साम्राज्य के संस्थापक के साथ-साथ कुशल प्रशासक भी था। उसके द्वारा स्थापित सुव्यवस्थित शासन प्रणाली बाद के शासकों के लिए भी अनुकरणीय सिद्ध हुई। मौर्यो के शासन प्रणाली की जानकारी मेगास्थनीज की इंडिका , कौटिल्य का अर्थशास्त्र से प्राप्त होती है ।शासन का स्वरूप एकतंत्रीय होते हुए भी चंद्रगुप्त के शासन प्रबंध का मुख्य उद्देश्य लोकहित था ।
चंद्रगुप्त के शासन प्रबंध का लक्ष्य अर्थशास्त्र के एक उदाहरण से स्पष्ट होता है :- 'प्रजा के सुख में ही राजा का सुख और प्रजा की भलाई में उसकी भलाई है। राजा को जो अच्छा लगे वह हितकर नहीं वरन् हितकर वह है जो प्रजा को अच्छा लगे ।'
केंद्रीय शासन
राजा : सैद्धांतिक रूप से राज्य का प्रधान तथा सर्वोच्च अधिकारी राजा होता था । राजाज्ञा ही कानून थी ।कौटिल्य के अनुसार राजा को असीमित अधिकार प्राप्त होने चाहिए ।कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि ' प्रजा के सुख में राजा का सुख एवं प्रजा के हित में उसका हित,प्रजा का कल्याण एवं हितकारी कार्य ही राजा का प्रिय एवं हितकारी कार्य होता है । '
राजा कार्यपालिका व्यवस्थापिका न्यायपालिका और सेना का प्रधान था राजा की आज्ञा की सर्वोच्च आज्ञा मानी जाती थी । राजा के कर्तव्य को कौटिल्य ने राजा के व्रत के नाम से संबोधित किया है अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में ।
न्यायपालिका के प्रधान के रूप में प्रजा को न्याय दिलाना राजा का मुख्य कर्तव्य था । मेगास्थनीज के विवरण से भी पता चलता है कि राजा दिन दिन भर न्यायालय में बैठकर प्रजा के न्याय संबंधी प्रार्थना पत्र पर विचार करता था । इसमें किसी भी प्रकार की बाधा उसे पसंद नहीं थी ।
कौटिल्य ने राजा को 'धर्मप्रवर्तक ' माना है । कानून बनाने का कार्य राजा के जिम्मे था । उसे तमाम कानूनों का स्रोत माना जाता था ।राजा के निश्चित अधिकार होते हुए भी वह एक निरंकुश राजा नहीं था । उसकी निरंकुशता पर प्रतिबंध लगाने के लिए मंत्री परिषद का गठन हुआ था । जिससे राजा को समय-समय पर अन्य विषयों पर विचार विमर्श करना पड़ता था । इस प्रकार राजा के शक्ति पर बहुत हद तक नियंत्रण बना रहता था ।
मंत्री परिषद : मौर्य काल में मंत्रिपरिषद एक अनिवार्य संस्था थी ।कौटिल्यने मंत्रियों की नियुक्ति के लिए उपधा प्रणाली का उल्लेख किया है उपधाएं चार प्रकार की थी : कामोंपधा , अर्थोपधा , धर्मोपधा और भयोपधा था । इन उपाधाओं के द्वारा व्यक्ति की परीक्षा गुप्त रूप से कर उसे मंत्री पद पर नियुक्त किया जाता था ।कौटिल्य के अनुसार मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं होनी चाहिए ,क्योंकि इससे बहुत ही गोपनीय बातें गोपनीय नहीं रह पाती । लेकिन फिर भी राजा को परामर्श देने के लिए मंत्रियों का होना अनिवार्य था जो उसे विभिन्न विषयों से संबंधित जानकारी प्रदान करते थे । मंत्रियों का वेतन पण में दिया जाता था । जिसमें मुख्य सचिव का वेतन 48000 फन था ।जबकि सामान्य मंत्रियों का वेतन 12000 पण ।
प्रशासकीय विभाग : केंद्रीय शासन के संचालन के लिए अनेक विभागों का गठन किया गया था । जिसे कौटिल्य ने तीर्थ का नाम दिया था ।प्रत्येक विभाग का एक अध्यक्ष होता था | जिसे ' अमर्त्य 'कहते थे । कौटिल्य के अर्थशास्त्र में लगभग 18 विभागों का उल्लेख किया गया है जिसमें से कुछ प्रमुख थे :
मंत्री और पुरोहित :पुरोहित और मंत्री दोनों अलग-अलग पद थे । इनके कार्य थे । विदेशों में राजदूतों की नियुक्ति , विदेशी नीति का संचालन ,शिक्षा की व्यवस्था करना आदि ।
समाहर्ता :जनपदों में शासन का संचालन करने वाले व्यक्ति को समाहर्ता कहा जाता था ।जमीन , महसूल ,नहर -कर , चूंगी वन व खानों की आय का निरीक्षण करना , राजकीय भूमि की खेती का प्रबंध आदि इनके कार्य थे । समाहर्ता के अंतर्गत - शुल्काध्यक्ष , सीताध्यक्ष सुराध्यक्ष ,गणिकाध्यक्ष , मुद्राध्यक्ष , नावाध्यक्ष , अश्वाध्यक्ष , पण्याध्यक्ष , लक्षणाध्यक्ष आदि पदाधिकारी कार्य करते थे ।
सन्निधाता : राज्य को कर के रूप में प्राप्त होने वाली सोना चांदी को सुरक्षित रखना कोश विभाग के अधिकारी का प्रमुख कार्य होता था । जिसे सन्निधाता कहां जाता था ।
सेनापति :युद्ध विभाग का संचालन करना सेनापति का मुख्य कार्य था ।
युवराज : यह राजा का उत्तराधिकारी होता था ।साथी व राजा को शासन संचालन में भी सहायता देता था ।
न्याय व्यवस्था :चंद्रगुप्त ने सुव्यवस्थित न्याय व्यवस्था को शुरू किया था मौर्य काल में दंड विधान बहुत कठोर था अपराधियों को अपराध स्वीकार करवाने के लिए यातनाएं दी जाती थी । गंभीर अपराध के लिए प्राण दंड का भी प्रावधान था । विश्वासघात और व्यभिचार की सजा अंग - विच्छेद थी । न्यायपालिका का सर्वोच्च अधिकारी राजा होता था । ग्राम संघ तथा राजा के न्यायालय को छोड़कर शेष न्यायालय दो श्रेणियों में बटे हुए थे कौटिल्य ने इन्हें धर्मस्थल और कंटकशोधन कहा है ।
i )धर्मस्थीय :इसमें दीवानी विवाद रखे जाते थे तथा - धर्मस्थीय के न्यायालयों के न्यायाधीशों को " धर्मस्थ ' कहा जाता था ।
ii ) कंटकशोधन : फौजदारी से संबंधित विवाद इसमें प्रस्तुत किए जाते थे । कंटकशोधन के न्यायाधीशों को "प्रदेष्टा " कहा जाता था ।
गुप्तचरों की सहायता : राज्य मे अच्छे से न्याय व्यवस्था के लिए तथा विवादास्पद विषय पर निर्णय लेने के लिए राज्य की ओर से गुप्तचरो की व्यवस्था की जाती थी । और इनके सलाह पर ही न्यायाधीश अपना निर्णय लेते थे ।
सेना का संगठन : राज्य पर आने वाली दोनों वित्तियां चाहे वह वाह्य हो या आंतरिक दोनों पर नियंत्रण सेना के द्वारा ही पाया जाता है ।चंद्रगुप्त मौर्य ने एक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना सेना के बल पर ही की थी । प्लिनी के अनुसार चंद्रगुप्त की सेना में छह लाख पैदल , 30,000 घुड़सवार, 9000 हाथी और 8000 रथ थे ।
सेना के अंग : .कौटिल्य ने सेना को चार भागों में बांटा हस्ती बल , रथ बल , अश्वबल और पैदल सैनिक । इन चारों अंगों को चतुरंग बल की संज्ञा दी गई थी । कौटिल्य ने सेना में क्षत्रिय बल को सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया ।
मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में बताया है कि सेना का नियंत्रण एक युद्ध कार्यालय करता था जिसमें 3 सदस्य होते थे । युद्ध कार्यालय छ : विभागों में विभक्त था । प्रत्येक विभाग में 5 सदस्य होते थे । इन विभागों के जिसमें पैदल सेना ,घुड़सवार ,रथ सेना , गज सेना , यातायात विभाग और नौसेना की देखभाल करना था ।
प्रांतीय शासन : शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्य के विभिन्न प्रांतों में प्रांतीय शासन की व्यवस्था की गई थी । इसके लिए राजवंशी व्यक्तियों की नियुक्ति की जाती थी । 'जिन्हें 'कुमार महामात्र ' के नाम से पुकारा जाता था । प्रांतों का शासन राज्यपाल करता था ।बड़े बड़े प्रांतों के राज्यपाल संभवत : राजकुमार हुआ करते थे। राज्यपाल को अनेक कार्य करने पड़ते - जिसमें प्रांतों में शांति व्यवस्था रखना ,केंद्रीय सरकार के कर की वसूली करना ,केंद्रीय शासन की नीति के अनुसार सामान्तो पर नियंत्रण रखना , पड़ोसी राज्यों की नीति पर निगरानी रखना आदि कार्य थे । प्रांतों की अंत :स्थिति के बारे में केंद्रीय सरकार को समय-समय पर जानकारी देते रहते थे और उनके आदेशानुसार ही अपनी नीति निश्चित करते थे । प्रांतीय शासकों की सहायता के लिए एक मंत्री परिषद का गठन होता था । यह संभवत केंद्रीय मंत्री परिषद के अधीन होती थी ।
नगर शासन : नगर शासन की व्यवस्था के बारे में मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक ' इंडिका ' में वर्णन किया है ।कौटिल्य के अनुसार राज्य की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक अधिकारी होता था । जिसे 'नागरिक ' कहते थे । इसकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती थी । कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में राज्य की राजधानी को चार भागों में बांटा है ।प्रत्येक भाग पर एक अधिकारी रहता था ,जिसे स्थानिक कहते थे । इस प्रकार राजधानी में 4 स्थानिक होते थे ।
नागरिकता के नियम : राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखना नागरिकों का प्रथम कर्तव्य था इसके लिए राज्य की ओर से नागरिकता के नियम बनाए गए थे और इसके प्रबंधन की व्यवस्था के लिए स्थानिक तथा गोप अधिकार होते थे ।
पाटलिपुत्र का शासन : मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी 600 फुट चौड़ी 32 फुट गहरी खाई नगर के बाहर बनाए गए थे । नगर की रक्षा के लिए खाई के अतिरिक्त चारों और लकड़ी की दीवार का निर्माण किया गया था जिसमें 64 दरवाजे तथा 570 बुर्ज थे । मेगास्थनीज के उल्लेखों से पता चलता है कि पाटलिपुत्र का शासन छ्ह समितियों द्वारा होता था । हर समिति में 5 पर सदस्य होते थे ।प्रत्येक समिति का कार्य बटा हुआ था ।
गुप्तचर व्यवस्था :चंद्रगुप्त के शासन में गुप्तचारों का विशेष महत्व था । गुप्तचर हर बात की सूचना राजा तक पहुंचाते थे ।वह अपने कार्य संपादन के लिए स्त्रियों व वेश्याओं की भी सहायता लेते थे 'गुप्तचरों का काम करने वाली स्त्रियों में कौटिल्य ने वेश्या , कुशीलवा , दासी, शिल्पकारी , भिक्षुणी ,आदि का उल्लेख किया है वहीं पुरुष गुप्त चर भी तापस ,कापटिक ,उदास्थित, वैदेहक तथा गृह प्रतीक के रूप में कार्य करते थे । कौटिल्य ने दो प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख किया है पहला संस्था और दूसरा संचारा ।
राज्य व्यवस्था : भूमि कर राज्य की आय का मुख्य स्रोत था । इसके अतिरिक्त बिक्री कर , खान कर ,जंगल कर, मादक द्रव्यों पर कर , मछली कर , सिंचाई कर ,चुंगी कर व जुर्माना भी राज्य के अन्य आय के स्रोत थे । आयात और निर्यात की वस्तुओं पर भी कर लगाया जाता था । साधारणतया आयात कर 20% होता था । वहीं निर्यात कर की दर निश्चित नहीं है । आयत कर को 'प्रवेश्य' कहां जाता था। जुर्माना राज्य की आय का एक महत्वपूर्ण साधन था छोटे छोटे अपराधों के लिए बड़े-बड़े जुर्माने होते थे कुछ व्यवसाय - व्यापार पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण रहता था |इनमें खान ,नमक ,शराब ,हथियार और मुद्रा प्रमुख थे ।इससे भी राज्य की आमदनी होती थी ।कभी-कभी राज्य कुछ व्यक्तियों को इन वस्तुओं के व्यवसाय का अधिकार भी दे देता था ।
राज्य को विभिन्न सूत्रों से प्राप्त हुआ धन कई प्रकार की चीजों पर खर्च किया जाता था । जैसे राजा और राजमहल का व्यय ,सेना ,राज्य कर्मचारियों का वेतन , शिल्पीयों को पुरस्कार ,दान ,धार्मिक संस्थाएं , सड़क, नहरों का निर्माण तथा अन्य सार्वजनिक हित के कार्य किए जाते थे ।
विद्वानों ने चंद्रगुप्त मौर्य की शासन व्यवस्था की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है 'चंद्रगुप्त की महानता केवल इस बात में है कि शासन व्यवस्था का कोई पैतृक अनुभव ना होते हुए भी हिंदू राजनीतिज्ञों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के आधार पर उसने अपना शासन चलाया और इतनी सफलता प्राप्त की थी कि विश्व के प्राचीन युग के इतिहास में उसका कोई साम्य दृष्टिगोचर नहीं होता ' । स्मिथ लिखते हैं कि तथाकथित प्रबंध की पूर्णता ' जबकि यह केवल रूपरेखा में व्यक्त की गई है हमें आश्चर्य में डाल देती है विभागीय व्यवस्था के विवरण का निरीक्षण करके हमारे आश्चर्य में और भी वृद्धि हो जाती है कि ईसा से 300 वर्ष पूर्व भी ऐसी व्यवस्था का आयोजन करके उसे सफलतापूर्वक लागू किया जा सका । अकबर की व्यवस्था में ऐसा कुछ भी नहीं था और इसमें भी संदेह है कि - प्राचीन यूनान के किसी भी नगर राज्य में इतनी उन्नत शासन व्यवस्था हो केवल यही नहीं अपितु समग्र रूप से सुव्यवस्थित शासन की साथ-साथ देश में शांति तथा समृद्धि और जनता में संतोष व्याप्त था ।
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Bahut helpful Raha
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