सम्राट अशोक

 सम्राट अशोक (269 ई. पू. -232  ई.पू.) 

              

अशोक भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के प्रमुख शासकों में से एक है उसे सम्राटों में महानतम सम्राट कहा जाता है ।वाह बिंदुसार की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य का शासक बना अशोक की महानता का कार्य विशाल साम्राज्य नहीं बल्कि उसके चरित्र उसके आदर्श और उन सिद्धांतों को बताया गया है जिसके आधार पर उसने शासन किया इतिहासकार एस.जी.वेल्स के अनुसार प्रत्येक युग प्रत्येक राष्ट्र ऐसे राजा को जन्म नहीं दे सकता ।अशोक की  समता आज तक भी विश्व इतिहास में किसी अन्य से नहीं की जा सकती ।
प्रारंभिक जीवन -अशोक के आरंभिक जीवन के विषय में हमें अभिलेखों से विशेष जानकारी नहीं मिलते इसीलिए साहित्यिक  सक्ष्य पर मुख्यता निर्भर रहना पड़ता है ।
बुद्ध घोष की रचनाएं '  - 'समन्त पासादिका '  
०  बौद्ध ग्रंथ -आयुमंजुश्रीमूल - कल्प 
गाथाए -महावंश ,दीपवंश , दिव्यावदान, अशोकावदान 
ब्राह्मण धार्मिक साहित्य में केवल पुराणों में अशोक का उल्लेख है ।
धर्मेतर  साहित्य में युवान च्वाग के वर्णनों में तथा कल्हण कृत राजतरंगिणी
                 अशोक के प्रारंभिक जीवन के विषय में जितने भी साहित्य साक्ष्म उपलब्ध हैं उनमें एक रुकता नहीं है' दिव्या वदान में उसकी माता का नाम जनपद कल्याणी बताया है जबकि महावंश में उसका नाम धर्मा और अशोकावदान के अनुसार सबद्रांगी था ।
महावंश के अनुसार बिंदुसार की 16 रानियां और 100 पुत्र थे जिनमें अशोक सबसे अधिक प्रतिभाशाली था । बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि अशोक अपने 99 भाइयों को मारकर गद्दी पर बैठा था । दिव्यावदान  में अशोक और उसके भाई सुशीम के बीच हुए उत्तराधिकारी युद्ध का उल्लेख है ।महाबोधिवंश में भी इसका वर्णन मिलता है ।  ये गाथाएं विश्वसनीय नहीं है क्योंकि यह अशोक के क्रूर जीवन के प्रति  परस्पर एकमत नहीं है । जहां अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि वह अपने सगे संबंधियों के प्रति उदार और उनकी सुख सुविधाओं का पूरा ध्यान रखता था । वही बौद्ध लेखक यह प्रमाणित करना चाहते हैं कि जब तक अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार नहीं किया था । तब तक वह क्रूर और नृशंसध था किंतु बौद्ध धर्म स्वीकार करते ही एक आदर्श राजा बन गया । महावंश में अशोक द्वारा राज्य की प्राप्ति और उसके अभिषेक में 4 वर्ष का अंतर बताया गया है | स्मिथ और भंडारकर गृह युद्ध की कथा को एकदम काल्पनिक मानते
है ।
 बिंदुसार के समय में अशोक अवंती राष्ट्र का राज्यपाल रह चुका था ।वहां उसका महादेवी नाम की शाक्यकुलीन विदिशा की राजकुमारी से विवाह हुआ ।उसी की संतान  अशोक का पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा थे । अवन्ति से अशोक को तक्षशिला का विद्रोह दबाने के लिए भेजा गया था ।
अशोक 273 ईस्वी पूर्व में सिंहासन पर बैठा । परंतु 4 साल तक गृहयुद्ध में रत रहने के कारण अशोक का वास्तविक राज्याभिषेक 269 ई. में हुआ ।वह एक महान सम्राट था ।राज्याभिषेक से पहले अशोक उज्जैन का राज्यपाल था । मास्की एवं  गुर्जरा अभिषेक में अशोक का नाम अशोक मिलता है । पुराणों में अशोक को अशोक वर्धन कहा गया है ।अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 7 वर्ष बाद कश्मीर और खोतान के अनेक क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में मिलाया । 

दिग्विजय की नीति


अशोक ने  राज्यरोहण के पश्चात  अपने पूर्वजों की ही तरह दिग्विजय की नीति अपनाई । यूं तो उसे अपने पूर्वजों से एक विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था । किंतु वह संपूर्ण भारत पर अधिकार करना चाहता था । कल्हण की राजतरंगिणी से मालूम होता है कि पहले उसने कश्मीर को जीता ।ऐसे अनुश्रुति है कि अशोक ने ही श्रीनगर को बसाया । कश्मीर में अनेक चैत्यों और स्तूपौ  का निर्माण भी उसके द्वारा करवाया गया ।उस समय अशोक का राज्य कश्मीर से नागौर तक तथा बंगाल में हिरात तक फैला हुआ था ।किंतु उसका राज्य कलिंग के कारण जो कि दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित था  से असुरक्षित था इस पर विजय प्राप्त करने के लिए उसने राज्याभिषेक  के आठवें वर्ष में कलिंग पर आक्रमण कर दिया । बिंदुसार मैं ने भी  कलिंग को जीतने की योजना बनाई थी । परन्तु वह अपनी योजना को पूरा नहीं कर सका ।

अशोक ने सिंहासन पर बैठते हैं अपने राज अभिषेक के आठवें वर्ष  में कलिंग पर आक्रमण करने का निश्चय किया । इसके दो कारण थे- पहला कलिंग  का शासक महत्वकांक्षी व शक्तिशाली था । दूसरा कलिंग समुद्री व्यापार का केंद्र था । इस कारण अशोक कलिंग को मौर्य साम्राज्य के लिए खतरा समझता था ।बस इसी कारण से अशोक ने एक विशाल सेना के साथ 261 ईसवी पूर्व में दक्षिण की ओर प्रस्थान किया और कलिंग पर चढ़ाई कर दी ।
 13 वें  शिलालेख में अशोक ने इस युद्ध की भीषणता का वर्णन किया है ।उसने इस  अभिलेख में बताया है कि इस युद्ध की  भीषणता  और अत्यधिक रक्तपात ने उसके हृदय को पिघला दिया | यह युद्ध ही था जिसके कारण उसके हृदय में युद्ध से घृणा हो गई तथा रणभूमि में ही उसने प्रतिज्ञा की कि वह अब जीवन भर युद्ध नहीं करेगा । उपगुप्त नामक ब बौद्ध भिक्षू ने उसे बौद्ध धर्म की शिक्षा दी थी ।
अशोक ने अपने पिता  बिंदुसार के मगध की दिग्विजय की नीति का त्याग करके धम्म विजय के नीति को अपना लिया । यह युद्ध भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि इस युद्ध ने लगभग 300 वर्षों से चली आ रही राज्य विस्तार की नीति को बदल दिया । इस युद्ध के बाद अशोक ने युद्ध की नीति का परित्याग कर दिया । उसने अब सर्वकल्याण और सर्वहित का  मार्ग अपना लिया । साम्राज्यवाद का युद्ध समाप्त हो गया और शांति सामाजिक उन्नति का युग प्रारंभ हुआ । रणघोष का स्थान धर्म घोष ने ले लिया ।

कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने प्रतिज्ञा की कि " धर्म की घोषणा करूंगा, धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार करूंगा ,जो लोग उसे सुनेंगे उनके अनुसार आचरण करने के लिए प्रेरित होंगे उनका आध्यात्मिक विकास होगा और धन की वृद्धि के बाद के साथ उनकी अभिवृद्धि होगी" ।

कलिंग युद्ध के बाद अशोक के जीवन में आए परिवर्तन को प्रोफेसर ए एच .सी  . राय चौधरी ने बहुत ही अच्छा वर्णन किया है -" कलिंग  की विजय मगध तथा भारत के इतिहास में एक महान सीमा चिन्ह है यह विजय तथा विकास की उस नीति का अंत करती है जिसका आरंभ बिम्बिसार ने अंगदेश पर विजय प्राप्त करके किया था यह एक नए युग का आरंभ करती है । यह युग है शांति  का सामाजिक उन्नति का धार्मिक प्रचार का तथा राजनीतिक अवरोध और सैनिक पतन का अध्यात्मिक विजय अथवा धम्म   विजय का युग आरंभ होने वाला था" ।

English map of Ashoka's Empire 


साम्राज्य विस्तार


कलिंग युद्ध के बाद शास्त्रों की दिग्विजय के स्थान पर अशोक ने धम्म विजय की नीति अपनाई । लेकिन इसका कदापि अर्थ नहीं था कि चंद्रगुप्त और बिंदुसार द्वारा अर्जित एवं संगठित राज्य को उसने विघटित होने के लिए छोड़ दिया । युद्ध समाप्ति के बाद भी विघटनकारी तत्वों को दबाने के लिए उसका बल अक्षुण्ण बना रहा ।कलिंग युद्ध के बाद केवल स्वतंत्र राज्यों को विजित  कर ।ने केए  सेना या बल का उपयोग नहीं किया गया ।  यही कारण है कि अशोक के समय में मोर्य सम्राज्य की सीमाएं हिंदुकुश और हिमालय से लेकर पश्चिम मे सौराष्ट्र और पूरब में कलिंग तक तथा नीचे दक्षिण में  चेर -चोल पाण्डय आदि राज्यों की सीमा तक विस्तृत रही ।

 अशोक का अपने शासनकाल के दौरान जिन क्षेत्रों पर अधिकार रहा इसका प्रमाण वहां से प्राप्त शिलालेख तथा अभिलेखों से प्राप्त होता है जिसमें से कुछ इस प्रकार है
पहला शिलालेख इसमें पशु बलि की निंदा की गई है।  
दूसरा शिलालेख में अशोक ने मनुष्य एवं पशु दोनों की चिकित्सा व्यवस्था का उल्लेख किया है ।
तीसरा अभिलेख इसमें राज्य के अधिकारियों को आदेश दिया गया कि वे हर पांचवें वर्ष के उपरांत दौरे पर जाएं इसमें कुछ धार्मिक नियमों का भी उल्लेख किया गया है ।
चौथा शिलालेख में उल्लेखित है कि भेरीघोष की जगह - धम्मघोष की  घोषणा की गई है ।
                      





पांचवा इस शिलालेख में धर्म- महामात्रों की नियुक्ति  के विषय में जानकारी मिलती है ।
छठा शिलालेख में आत्म नियंत्रण की शिक्षा दी गई है ।
सातवें एवं आठवां शिलालेख में अशोक की तीर्थ-यात्राओं  का उल्लेख किया गया है ।
वहीं नौवाँ शिलालेख में राजा को दिए जाने वाले सच्ची भेंट तथा सच्चे शिष्टाचार का उल्लेख किया गया है ।
दसवाँ इसमें अशोक ने आदेश दिया है कि राजा तथा उच्च अधिकारी हमेशा प्रजा के हित में  सोचें ।
ग्यारहवाँ शिलालेख में धम्म की व्याख्या की गई है ।
वहीं 12वीं शिलालेख में स्त्री महामात्रों की नियुक्ति एवं सभी प्रकार के विचारों के सम्मान की बात की गई है । 
तेरहवाँ शिलालेख काफी प्रमुख है इसमें कलिंग युद्ध का वर्णन  किया गया है ।साथ ही इसमें बताया गया है कि कैसे युद्ध मे हुए भीषण रक्त पात की वजह से अशोक का हृदय परिवर्तन होता है । इसी में पड़ोसी राजाओं का भी वर्णन है ।
14वां शिलालेख में अशोक ने जनता को धार्मिक जीवन बिताने के लिए प्रेरित किया है ।
          भारत में शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम अशोक के शासनकाल में ही प्रारंभ हुआ । वही अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी, खरोष्ठी , अरमाइक एवं ग्रीक लिपि का प्रयोग हमें मिलता है । ग्रीक एवं अरमाइक लिपि का अभिलेख अफगानित्तान से ,खरोष्ठी लिपि का अभिलेख उत्तर पश्चिम पाकिस्तान से और शेष भारत से ब्राह्मी लिपि का अभिलेख हमें मिले हैं ।अशोक के अभिलेखों को तीन भागों में बांटा गया है- पहला शिलालेख ,दूसरा स्तंभ लेख तथा तीसरा गुहालेख ।
                                          


अशोक को अपने पूर्वजों से एक विस्तृत  साम्राज्य प्राप्त हुआ था । उत्तर- पशिचम में हीरात ,कंदहार ,बलूचिस्तान और काबुल ।इन क्षेत्रों पर अशोक का अधिकार बना रहा । क्योंकि उसके शिलालेख कंधार के निकट शरेकुना , पेशावर में शाहबाजगढ़ी और हजारा जिले में मानसेहरा में मिले हैं ।
                           

 




* युवांग च्वांग के लेखों से हमें पता चलता है कि कापिश  और जलालाबाद में अशोक ने स्तूप बनवाएं और कश्मीर उसके राज्य में सम्मिलित था ।

* देहरादून जिले में कालसी नामक स्थान से प्राप्त अशोक के शिलालेख से पता चलता है कि गढ़वाल देहरादून का पहाड़ी क्षेत्र अशोक के अधिकार में था ।
* अभिलेखों अनुश्रुतियों  और अशोक द्वारा निर्मित स्मारकों से ज्ञात होता है कि नेपाल और उसकी तराई भू-भाग पर अशोक का अधिकार था ।
*प्रयाग स्तंभ लेख यह पहले कौशांबी में स्थित था । इस स्तंभ लेख को अकबर ने इलाहाबाद के किले में स्थापित किया ।
* दिल्ली  टोपरा प्रयाग स्तंभ लेख फिरोजा फिरोजशाह तुगलक के द्वारा टोपरा से दिल्ली लाया गया  । 
*दिल्ली मेरठ पहले मेरठ में स्थित यह  स्तंभ लेख फिरोजशाह द्वारा दिल्ली लाया गया 
* अशोक के अभिलेख रुम्मिनदेई और   निम्लवि से भी मिले हैं ।  अशोक का सबसे छोटा स्तंभ लेख है रूम्मिदेई । इसी में लुम्बिनी में धम्म यात्रा के दौरान अशोक के द्वारा  घटाए गए  भू राजस्व की दर की बात बताई गई है।
                       


*बिहार के चंपारण में लोरिया अरेराज और लौरिया नंदनगढ़ में अशोक के स्तंभ लेख मिले हैं । इन स्तंभ  लेखों से प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है कि नेपाल की तराई का संपूर्ण भू-भाग अशोक के राज्य में सम्मिलित था ।
* रामपुरवा का अभिलेख और ललित पाटन का अशोक द्वारा निर्मित स्मारक स्तूप इस बात के प्रमाण हैं कि नेपाल पर अशोक का अधिकार था ।
* नेपाली अनुश्रुतियों से भी यह ज्ञात होता है कि अशोक ने नेपाल के कई स्थानों की यात्रा की और वहां देवपाटन या पाटल नामक नगर भी बसाया था ।


*  अशोक के स्तंभ लेखों की संख्या 6 है । ये स्तम्भ लेख  केवल ब्राम्ही लिपि में लिखी गई है ।
* ऐसे प्रमाण मिले हैं कि अशोक की पुत्री चारूमती का विवाह नेपाल के क्षत्रिय राजकुमार देवपाल से हुआ था । वहीं पश्चिम नेपाल का प्रसिद्ध  स्वयंभूनाथ का मंदिर भी अशोक द्वारा बनवाया गया था ।
*यूनानी लेखको ,बौद्ध ग्रंथ, दिव्यावदान एवं हेवेनसंग के विवरण से ज्ञात होता है कि अशोक के समय में बंगाल मगध के अधीन था ।
* कलिंग  की  विजय तो  स्वयं अशोक ने ही की थी । इस प्रदेश में पूरी जिले में धौली और गंजाम  जिले में जोगुडा से दो शिलालेख मिले हैं । 
*अशोक ने भारत के अंदर चोल ,पाण्ड्य, केरलपुत्र , सतियपुत्र और ताम्रपर्णि का उल्लेख किया है ।भारत के बाहर उसके संबंध सीरिया , मिस्र , मकदुनिया, सिरीन तथा एपिरस राज्य से थे । वहीं राज्य के अंदर अशोक ने बौद्धगया , धौली, उज्जीयनी , सुवर्णा गिरि, कौशाम्बी , पाटलिपुत्र आदि नगरों का उल्लेख किया है ।
* महा वंश में अशोक को समस्त जंबूद्वीप का एकछत्र सम्राट कहा गया है ।
* रूपनाथ अभिलेख से ज्ञात होता है कि समस्त जंबूद्वीप सम्राट अशोक का कार्यक्षेत्र था और उनके पराक्रम के फल से समस्त जंबूद्वीप के देवता जो पहले मनुष्यों से अमित्र थे वे मनुष्यों से मिल गए ।

अशोक की विदेश नीति

अशोक भी अपने पूर्वजों चन्द्रगुप्त और बिन्दुसार की तरह ही देशी शक्तियों के लिए आक्रामक और विदेशी शक्तियों के लिए मित्र रहा ।जहां अपने शासनकाल के प्रथम 13 वर्ष तक उसने मौर्य साम्राज्य की परंपरागत नीति का अनुसरण किया ।भारत के अंदर अपने साम्राज्य के विस्तार और विदेशी शासकों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार की नीति अपनाई ।
अशोक का संबंध बाहरी राज्यों के साथ मैत्री,  सौहार्दपूर्ण, सहयोग और सह अस्तिव का था ।अपने राष्ट्र के साथ-साथ वह समान रूप से बाहरी राष्ट्रों के हित कामना के लिए भी प्रयत्नशील था । निश्चित ही उसकी इस नीति ने बाहरी देशों के साथ भारत के संबंध दृढ़  कर दिए थे । अशोक की इस नीति का आधार था उसकी घोषित" सर्व कल्याण अर्थात् विश्वकल्याण की कामना और सब प्राणियों के प्रति सुरक्षा, संयम, समुचित और मृदता के व्यवहार  की सक्रिय भावना ।जिसके लिए अशोक जीवन प्रयत्न करता रहा ।
 यवनों के साथ- साथ उसने चोल ,पांडेय, सतियपुत्र, केरलपुत्र और ताम्रपर्णी के राज्यों के साथ भी सर्व कल्याण ,सहयोग एवं सह - अस्तित्व की नीति अपनाई ।

अशोक का शासन प्रबंध

अशोक एक आदर्श राजा था ।उसका राज्य काल  सर्वलोक  हित के लिए विख्यात है ।छठे शिलालेख और  कलिंग के दोनों लेखों से उसके राजत्व के आदर्श का ज्ञान होता है ।
 छठे शिलालेख में अशोक ने राजस्व के आदर्श की व्याख्या इस प्रकार की है । " सर्वलोकहित वस्तुतः मेरे द्वारा कर्तव्य माना गया है ।   सर्वलोकहित के अतिरिक्त कोई दूसरा काम नहीं है ।मैं इसलिए कार्य करता हूं कि मैं जीव धारियों के प्रति अपने ऋण से उऋण होऊ और यहां कुछ प्राणियों को सुखी करू "। प्राचीन शास्त्रों में तीन ऋणों  का उल्लेख है-पितृ ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण ।  अशोक ने राजा के लिए चौथा ऋण भूत ऋण भी जोड़ दिया । कलिंग शिलालेख में अशोक ने प्रजा को अपनी संतान माना -"सब मनुष्य मेरी संतान है" ।

 डॉ ॰आर ॰सी मजूमदार ने अशोक का वर्णन करते हुए कहा है कि शायद ही किसी शासक ने राजा और प्रजा के संबंधों पर इतने सरल उदार भाषा में अपने विचार व्यक्त किया हो ।इस प्रकार हम देखते हैं कि पितृवत् शासन के सिद्धांत पर आधारित सर्वलोकहित ही अशोक का आदर्श   था ।
राजत्व के आदर्शों को कार्यान्वित करने के उपाय -अशोक ने अपने आदर्शों को कार्यान्वित करने के लिए निम्नलिखित सुधार किए ।

अधिकारियों का दौरा - अशोक ने धर्म प्रचार, न्याय  और रक्षा के उद्देश्य से कई उच्च अधिकारियों जैसे रज्जुक , युतो और महामत्यो की नियुक्ति कि ।इन अधिकारियों को 3-3 और 5 -5 वर्षों पर दौरा करने का आदेश दिया गया था । यह अधिकारी निगरानी करते थे कि जनता का आकारण बंधन और आकरण परीक्लेश ना दिया जाए ।

धम्म महामित्रो की नियुक्ति - साम्राज्य में धर्म और दान के नियमन करने के लिए धम्म महामात्रों की नियुक्ति की जाती थी । इनका प्रमुख कार्य जन कल्याण संबंधी अनेक कार्य करना जैसे धर्म प्रचार एवं विभिन्न पथों के बीच एकता स्थापित करना था । यह न्यायालयों द्वारा दिए गए दंड पर भी पूर्ण विचार करते थे और दंड माफ भी कर सकते थे ।

प्रतिवेदको की नियुक्ति - जनता की आवाज या फरियाद को किसी भी घड़ी किसी भी स्थान में राजा तक  पहुंचाने के लिए प्रतिवेदको की नियुक्ति की गई थी ।

रज्जुको को लोकहित के कार्य करने की स्वतंत्रता - अपने आदेश की पूर्ति के लिए अशोक ने  रज्जुको को नियुक्त किया था । साथ ही उसने राज्जुको को  न्याय संबंधी सब अधिकार दे दिए ।ताकि वह बिना किसी रूकावट के लोक हित के कार्य कर सकें ।
                                  अशोक ने अपने राज्य में धम्म विजय , धम्म यात्रा और धम्म  श्रवण की व्यवस्था करवायी और सभी धम्म वालों को वास की सुविधा दी गई । उसने पशु तथा मानव कल्याण के लिए समान रूप से कार्य किया । उसने भूमि - कर की राशि मे भी कमी कर दी ।
                  अशोक के शासनकाल में यद्यपि शासन व्यवस्था का केंद्र बिंदु अभी भी सम्राट ही था । किंतु प्रजा के हित और अपने उत्तरदायित्वों का निवाहने मे वह पूर्ण जागरूक था । प्रजा- पालन और उनका हित चिंतन ही अशोक के जीवन का एकमात्र ध्यय था ।

अशोक केवल कोरा सैद्धांतिक नहीं था । अपितु एक योग्य शासक भी था ।  अपने श्रेष्ठ धार्मिक भावनाओं,प्रजावत्सलता और अहिंसात्मक नीति के होते हुए भी उसने शासन के कर्तव्यों का इतनी कुशलता से पालन किया था कि उसके विशाल साम्राज्य में पूर्ण शांति व्यवस्था तथा समृद्धि व्याप्त थी ।

मंत्रिपरिषद - छठे शिलालेख से ज्ञात होता है कि शासन व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए मंत्रिपरिषद का गठन किया गया था । मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या 12 ,16 या 20 हुआ करती थी ।  सम्राट को सभी महत्वपूर्ण विषयों पर परामर्श मंत्रिपरिषद देती थी । साथ  ही सम्राट द्वारा की गई घोषणा के संबंध में सुझाव का प्रस्ताव भी उपस्थित कर सकती थी । 

सम्राज्य में मुख्यमंत्री एवं पुरोहित की नियुक्ति के पूर्व इन के चरित्र को काफी जांचा परखा जाता था जिसे उपधा परीक्षण कहा जाता था ।

सम्राट का प्रमुख सहायक उप राजा होता था । जो राजकुलीन  व्यक्ति होता था । अशोक के समय में उसका  भाई तिष्य उपराजा था । दूसरा सहायक युवराज होता था वह राजकाज में राजा की सहायता करता था । तीसरा प्रमुख सहायक अग्रमात्य होता था ।अशोक के समय में 'राधागुप्त ' अग्रमात्य था ।

स्वायत्त शासन  


 अशोक के 13वें शिलालेख से हमें यह होता है कि उसके साम्राज्य में कुछ ऐसे भी राज्य थे जो अशोक की प्रभुसत्ता को स्वीकार करते थे ।किंतु उन्हें स्वशासन का अधिकार प्राप्त था । ये राज्य थे  - यवन, कंबोज , नाभक ,नाभपती आंध्र , भोज परिंदे । इनमें से कुछ तो संभवत पश्चिमोत्तर सीमांत पर स्थित थे और कुछ दूर दक्षिण में ।

प्रान्तीय शासन


अशोक के समय में संपूर्ण मौर्य साम्राज्य 5 प्रांतों में विभाजित था । पहला प्राच्य -जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी । दूसरा उत्तरा पथ  - जिसकी राजधानी तक्षशिला थी ।तीसरा कलिंग - जिसकी राजधानी तोसली थी । चौथा अवन्ति पथ - जिसकी राजधानी उज्जैन थी । पांचवा दक्षिणापथ - जिसकी राजधानी स्वर्णगिरी थी । पाटलिपुत्र में सम्राट स्वयं रहता था जो प्राच्य तथा मध्य देश का शासन स्वयं करता था ।शेष प्रांतों का शासन राजकुमार करते थे । प्रांतीय अधिकारियों पर केंद्र का नियंत्रण रहता था ।प्रांतों को चक्र कहा जाता था ।प्रांतों के प्रशासक कुमार या आर्यपुत्र या राष्ट्रिक कहलाते थे ।प्रांतों का विभाजन विषय में किया गया था । जो विषयपति के अधीन होते थे ।प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी । जिसका प्रमुख ग्रामीण कहलाता था ।

अन्य अधिकारी - अशोक के शिलालेख से हमें अनेक पदाधिकारियों का ज्ञान होता है । डॉ .हेम . चंद्र चौधरी ने निम्नलिखित 12 कर्मचारियों का उल्लेख किया है -

धर्म महामात्र -धर्म महामात्र की नियुक्ति अशोक ने बौद्ध धर्म में दीक्षित हो जाने के पश्चात की थी ।वह स्वयं कहता है आज के पूर्व निकट भूतकाल में भी धर्म महामात्र नहीं रहे । इन धर्म माहामात्रों  के कर्तव्यों का उल्लेख वह स्वयं करता है । इनका प्रमुख कार्य  प्रजा में धम्म का प्रचार करना एवं कल्याणकारी कार्य करना आदि था।

महामात्रों की नियुक्ति -  साम्राज्य के प्रत्येक जिले तथा नगर में भिन्न- भिन्न कार्यों के लिए भिन्न - भिन्न प्रकार के महामंत्री नियुक्त किए गए थे ।  ये महामात्र अपने-अपने विभागों के अध्यक्ष होते थे और उन विभागों का पुर्ण उत्तरदायित्व उन्हीं पर था ।

 रज्जुक - अशोक ने अपने चतुर्थ स्तंभ लेख में रज्जुक की नियुक्ति का उल्लेख किया है । यह कई लाख लोगों पर शासन करते थे । जनपदों की देखभाल करना भी इनका प्रमुख कार्य था ।वह न्यायधीश का भी कार्य करते थे । संभवत भूमि की नाप का कार्य भी यह किया करते थे ।डॉ स्मिथ का विचार है कि रजक का पद कुमार से नीचा होता था । वहीं डॉ . रामशंकर त्रिपाठी का विचार है कि साधारण छोटे प्रांतों का शासक संभवत रज्जुक कहलाते थे ।
प्रादेशिक - डॉ .रामशंकर त्रिपाठी का कथन है कि "प्रादेशिक आधुनिक कमिश्नरों की भांति विस्तृत भू - खंडों के शासक थे । प्रादेशिक संभवत स्थानीय गवर्नर होते थे और उनका पद प्रांताधीश के नीचे था ।

युत अथवा युक्त - युत अथवा युक्त का पद अति प्राचीन है । मनु के अनुसार वह खोई संपत्ति का रक्षक था । उसके नीचे उपायुक्त होते थे । जिसकी सहायता से वह भूमि कर वसूल करता और जिला कोष की रक्षा करता साथ  ही आय - व्यय का लेखा तैयार करता था ।

निम्न अधिकारी - शासन के अन्य अधिकारी साधारण पुरुष संज्ञा से संबोधित होते थे । उनके उच्च निम्न तथा मध्यम वर्ग थे ।" प्रतिवेदक" राजा को  प्रत्येक बात की सूचना देते थे ।  ब्रजभूमिक चारागाहों की देखभाल करते थे । इनके अतिरिक्त लिपिकार दूत कारणक तथा आयुक्त नामक अधिकारी भी होते थे ।

न्याय व्यवस्था - राजा कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका  का भी प्रधान होता था । वह राज्य का कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए  धर्मानुसार नियम भी बना सकता था । अशोक के चौथे स्तंभ लेख और द्वितीय कलिंग शिलालेख में उसकी न्याय व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है । अशोक न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी स्वीकारात्मक पक्ष पर बल देता था । उसने न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त रखा था । अशोक व्यवहार समता और दंड समता पर अधिक बल देता था । धर्ममहामात्रों को भी न्याय संबंधी कार्य दिए जाते थे ।राजा को अपील सुनने ,निवेदन सुनने और रिहाई करने का पूरा अधिकार प्राप्त था । 

शासन सुधार तथा लोक कल्याण के कार्य अशोक ने शासन व्यवस्था में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण सुधार किए थे जो इस प्रकार हैं :  

नई अधिकारियों की नियुक्ति - अशोक ने धर्म -युत ,धर्म- महामात्र और स्त्री -अध्यक्ष -महामात्र नामक अधिकारियों की नियुक्ति की थी ।  ये अधिकारी प्रजा में सद्भावना सहनशीलता और नैतिक विचारों को फैलाते थे ।साथ ही यह अधिकारी प्रजा के भौतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए प्रयत्न करते थे । आवश्यकता अनुसार अपराधियों को दंडित करना भी इन अधिकारियों का कार्य था ।स्त्रियों की भलाई के लिए 'स्त्री -अध्यक्ष -महामात्र' की नियुक्ति अशोक के द्वारा की गई थी ।

प्रजा से निकट सम्पर्क- दूरस्थ प्रदेशों में भी प्रजा को उचित न्याय मिलता रहे इसके लिए अशोक ने युत,रज्जक  प्रादेशिक, महामात्र आदि अधिकारियों की नियुक्ति की । ये अधिकारी प्रति तीसरे और पांचवें वर्ष उस स्थान का दौरा करते और वहां के सारे समस्याओं से राजा को अवगत कराते थे ।
धन यात्राओं की व्यवस्था -  अशोक ने विहार- यात्राओं की प्रथा बंद कर दी ।इन यात्राओं में जानवरों का शिकार किया जाता  था । सम्राट ने इनके स्थान पर धर्म यात्राएं आरंभ की । इन धर्म यात्राओं से सम्राट स्वयं जनता को धर्म उपदेश देता था ।
मध निषेध -  अशोक ने समाज में उन प्रथा और उस उत्सवों पर प्रतिबंध लगा दिया जिनसे लोग मांस और मदिरा का उपयोग करते थे तथा जानवरों की हत्या की जाती थी ।
पशु हत्या निषेध - अशोक ने एक आज्ञा द्वारा पशुओं की हत्या बंद करवा दी ।राजकीय पाकशाला में भी मांस भक्षण बंद कर दिया गया था । वह प्रतिवर्ष राज्याभिषेक की गांठ पर बंन्दियों  को मुक्त करता था तथा प्राण दण्ड पाए अपराधियों की जीवन अवधि 3 दिन बढ़ा दी जाती थी ।
लोकहित के अन्य कार्य - अशोक ने केवल मनुष्य के लिए ही नहीं अपितु पशुओं के लिए भी औषध्यालय खुलवाएं और औषधियों की समुचित व्यवस्था की उसने अनेक जड़ी बूटियों को लगवाने का प्रबंध करवाया ।

अशोक का धम्म कलिंग युद्ध के बाद अशोक का जीवन ही बदल गया । उसमें बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया । उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु से अशोक ने बौद्ध धर्म की शिक्षा ली थी ।अशोक  ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा था ।उसने भेरी घोष के स्थान पर धम्म घोष को अपना लिया । भावु - शिलालेख से हमे ज्ञात होता है कि बौद्ध धर्म के त्रिरत्न - बुद्ध , धर्म और संघ में अशोक ने विश्वास प्रकट किया।
     अशोक ने जिस धम्म का प्रचार अपने शिलालेखों के माध्यम से सर्वसाधन में किया था ।वह उसके व्यक्तिगत धर्म से भिन्न थी ।समाज में टकराव को रोकने, समाजिक एकता को बनाए रखने और जनसाधन की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए अशोक ने धम्म के  विचार को जन्म दिया ।
डॉ . रोमिला थापर ने धम्म को 'अशोक का अन्वेषण' स्वीकार किया है । 

प्लीट ने अशोक के धम्म को राजधर्म बताया है जिसमें राजनीतिक एवं नैतिक सिद्धांतों का समावेश था ।

डॉ स्मिथ ने अशोक के धम्म को सामान्य नैतिक आदर्श के रूप में स्वीकार किया है उनका मत है कि अशोक का धर्म किसी संप्रदाय विशेष से सम्बन्धित नहीं थी बल्कि उसके सिद्धांत तो प्रत्येक भारतीय धर्म में सामान्य है ।
अशोक ने अपने धर्म में केवल यह नहीं  बताया कि धर्मोन्नती क्या-क्या करने से होती है ।बल्कि उसने जनता को उन अवगुणों से भी अवगत कराया । जो धर्मोन्नती के मार्ग में बाधक है । ये अवगुण है - चाण्डय, नैष्ठुर्य, क्रोध, अभिमान और ईष्या । इन पापों से बचने के लिए भी उस ने उपदेश दिया । 
मौर्य वंश 137 137 वर्षों तक रहा भगवत पुराण के अनुसार मौर्य वंश के में 10 राजा हुए जबकि वायु पुराण के अनुसार 9 राजा मौर्य वंश में हुए मौर्य वंश का अंतिम शासक ने हजरत था इसकी हत्या करके सांस की हत्या के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 150 ईसवी पूर्व में कर दी और मगध पर शुंग वंश की न्यू दिल्ली ।
                              

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