indus valley civilization

        सिंधु घाटी सभ्यता

हड़प्पा की कहानी :

मानव सभ्यता का प्राचीनतम रुप नदियों की घाटियों में बसे नगरों और ग्रामों में देखने को मिलती है। फिर वह मिस्र में नील नदी मेसोपोटामिया में दजला और फुरात नदियों के किनारे विकसित हुई मानव सभ्यता हो या आज से 5 या 6000 वर्ष पूर्ण विकसित हुई उच्चकोटि की मानव सभ्यता जो भारत वर्ष में सिंधु नदी की घाटी में विकसित हुई ।
इस उच्चकोटि की सभ्यता के अवशेष सिंधु पंजाब, गुजरात, सौराष्ट्र आदि अनेक स्थलों के उत्खनन से प्राप्त होती है।  
*इस सभ्यता की खोज ने 1921 ई० तक इतिहासकारों की धारणा को ही परिवर्तित कर दिया जिसमें वे भारत की प्राचीनतम सभ्यता वैदिक सभ्यता को बताते थे ।
*सिंधु नदी की 'घाटी में स्थित मोहनजोदड़ो, हड़प्पा आदि स्थलों की खुदाई में प्राप्तवस्तु के अवशेषों ने प्रमाणित कर दिया कि आर्यों की सभ्यता से पूर्व भी भारत में सिंधु नदी की घाटी में एक उच्च कोटि की  नागरिक सभ्यता विकसित हो चुकी थी ।जो समकालीन मिश्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता से अधिक विकसित थी ।
*सिंधुघाटी की सभ्यता के संबंध में हमारे जानकारी मुख्यतः पुरातात्विक प्रमाणों पर आधारित है क्योंकि इस काल का कोई साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है । जो भी लिखित साक्ष्य मिले हैं उन्हें अभी तक संतोषप्रद  ढंग  से पढ़ा नहीं जा सका है ।1875 में प्रसिद्ध पुरातत्ववेता  अलेक्जेन्डर कनिंघम का  ध्यान हड़प्पा के पुरातात्विक अवशेषों की ओर आकृष्ट हुआ । उन्हें यहाँ से लिपिबद्ध मुहर तथा भवनों के अवशेष भी मिले थे ।  जिससे उन्होंने यहां प्राचीन शहर होने का अनुमान लगाया ।

नामकरण

आधुनिक पाकिस्तान में आज से लगभग 150 साल पहले जब पंजाब में पहली बार रेलवे लाइनें बिछाई जा रही थी तो इस काम में जुटे इंजीनियरों को अचानक हड़प्पा पुरास्थल मिला । उन्होंने सोचा कि यह एक ऐसा खण्डहर है जहां से अच्छी ईट मिलेगी । यह सोचकर भी हड़प्पा के खंडहरों से हजारों ईंट उठा ले गए । जिससे उन्होंने रेलवे लाइनें बिछाई ।उनके ऐसे कार्य से कई इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गई ।
1921 ई० में पुरातत्वविदो ने इस स्थल को ढूंढा और बताया कि यह खण्डहर उपमहाद्वीप के सबसे पुराने शहरों में से एक है क्योंकि इस नगर की खोज सबसे पहले हुई थी इसीलिए बाद में मिलने वाले इस प्रकार की सभी पूरास्थलों में जो इमारतें और चीजें मिली उन्हें हड़प्पा सभ्यता की इमारतें कहा गया ।
सिंधुघाटी सभ्यता के लिए मोटे तौर पर तीन नामों का प्रयोग किया जाता है । सिंधु सभ्यता , सिंधुघाटी की सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता। इन तीनों शब्दाबली का एक ही अर्थ है ।
 हड़प्पा सभ्यता एक कांस्ययुगीन सभ्यता है जिसे अद्य इतिहास के अंतर्गत माना जाता है । हड़प्पा टीले का सर्वप्रथम उल्लेख 1826 ई० में चा चालर्स मैसन ने किया परन्तु इस सभ्यता का रहस्योउद्घाटन 1856 ईसवी में कराची और लाहौर के बीच रेल पटरी बिछाने के दौरान जॉन ब्रेटन और विलियम ब्रेटन ने किया ।1922 ई० में मोहनजोदड़ो की खुदाई के आधार पर 1924 ई० में भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक जॉन मार्शल ने इस सभ्यता की घोषणा की ।
सिंधु सभ्यता के स्थलों की  संख्या अब तक 350 तक पहुंच गई है | विद्वानों की धारणा है कि सिंधु सभ्यता के  अंतर्गत विशाल प्रदेशों की व्यवस्था और शासन दो राजधानियों द्वारा किया जाता होगा । प्रथम पंजाब में हड़प्पा उत्तर प्रदेश की राजधानी था तथा दूसरा सिंध प्रदेश में स्थित मोहनजोदड़ो दक्षिण प्रदेश की राजधानी थी ।
 ये नगर आधुनिक पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों भारत के गुजरात , राजस्थान ,हरियाणा और पंजाब प्रांत में मिले हैं । 
सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल दाश्य नदी के किनारे स्थित सुत्कागेंडोर( बलूचिस्तान) पूर्वी पुरास्थल हिण्डन नदी के किनारे मालमगीरपुर ( जिला मेरठ , उत्तर प्रदेश ) उत्तरी पुरास्थल  चिनाव नदी के तट पर अखनूर के निकट मादा (जम्मू कश्मीर ) तथा दक्षिणी पुरास्थल गोदावरी नदी के तट पर दाइमाबाद ( जिला अहमदनगर महाराष्ट्र ) में मिले हैं ।

सिंधघाटी सभ्यता के कुछ प्रमुख स्थल

* बलूचिस्तान - यहां व्यापार मार्गों के साथ - साथ स्थल  मार्ग पाए गए  हैं ।  इनमें तीन स्थल महत्वपूर्ण माने जाते हैं - सुत्कागेंडोर , सप्तिकाकोह  और बालाकोट ।

 * उत्तरी पश्चिमी सीमांत - यहां सारी सामग्री गोमल घाटी में केंद्रित है ।गुमला जैसे स्थल पर सिंधु सभ्यता के अवशेष पाए गए हैं ।

* सिंधु - सिंधु नदी के बाढ़ वाले मैदान के ऊपर अनेक स्थल मिले हैं ।जैसे -मोहनजोदड़ो ,चन्हूदरो , जंडेरजोदड़ो , अमरी इत्यादी ।
* मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के लरकाना जिले में स्थित है यहां से विशाल स्नानागार के अवशेष मिले हैं।
* चान्हूदरो से पकायी गई ईटों के भवन और मनके बनाने के कारखाने मिले हैं ।
 * पश्चिमी पंजाब - रावी नदी के किनारे सर्वप्रथम हड़प्पा के उत्खनन में ही सिंधु सभ्यता के अवशेष मिले थे । यहां अन्नागार पाए गए हैं ।
* बहावलपुर -  इस क्षेत्र में सिंधु सभ्यता के स्थल पाए गए हैं । यह स्थल सूखी हुई सरस्वती नदी के मार्ग पर है ।
* राजस्थान - इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्थल कालीबंगा है । जो गंगानगर जिले में स्थित है । यहां से लकड़ी की नालियों के अवशेष मिले हैं ।
*हरियाणा -  आधुनिक हरियाणा के हिसार जिले में सिंधु सभ्यता का महत्वपूर्ण स्थान बनमाली स्थित है ।
पूर्वी पंजाब - इस क्षेत्र में भी अनेक स्थल मिले हैं रोपड़ तथा संघोल महत्वपूर्ण स्थल है ।चंडीगढ़ में भी हड़प्पा संस्कृति के नीक्षेप  मिले हैं ।
*४गंगा यमुना दोआब - यहां के स्थल आलमगीरपुर तक फैले हुए हैं । हुसाल तथा दोआब के ऊपरी हिस्से में भी अनेक स्थल है ।
*जम्मू - इस क्षेत्र का प्रमुख स्थल मॉदा है ।
* गुजरात- कच्छ और काठियावाड़ यहां के प्रमुख क्षेत्र है । सुरकोतदा , लोथल और भगतराव प्रमुख स्थल है जो कि भगतराव किम सागर संगम पर है ।

समय का निर्धारण

० सिंधु सभ्यता के काल निर्धारण के संबंध में विद्वानों में काफी मतभेद है । 
०' सर जॉन मार्शल ' ने सभ्यता का काल 3250 ईस्वी से 2750 ईस्वी पूर्व 
० गार्डन चौक के अनुसार 3000 के आरंभ में यह सभ्यता विकसित हुई । कुछ इतिहासकार सिंधु सभ्यता को मिश्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता के समकालीन मानते हैं ।

० आधुनिक काल में सिंधु सभ्यता का काल रेडियो कार्बन विधि से निर्धारित किया गया है इसके अनुसार इस सभ्यता का काल 2380 से 1750 माना जाता है । 

सिंधु सभ्यता के निर्माता 

सिंधु सभ्यता का जो रूप हमारे सामने आया है । वह एक विकसित संस्कृति का रूप है ।इसके प्रारंभिक चरण एवं क्रमिक विकास के बारे में निश्चित जानकारी नहीं है । यह विवादग्रस्त प्रश्न है कि सिंधु सभ्यता के निर्माता कौन थे?

 कुछ विद्वान हड़प्पा संस्कृति का प्रेरक मेसोपोटामिया की संस्कृति को मानते हैं । 
# ' ह्रवीलर ' का मत है  कि - इनके निर्माता कच्ची ईंटों के भवन निर्माण करने के अभ्यस्त थे । इस लिए हडप्पा संस्कृति के जनक मेसोपोटामिया के निवासी हो सकते है क्योकिं मेसोपोटामिया के निवासी  कच्ची ईंटों से भवन निर्माण कला मे अधिक अभयस्त थे । 
 # " गॉडर्न चाइल्ड " ने में भी इस मत का समर्थन किया है । वहीं कुछ अन्य विद्वान मेसोपोटामिया के निवासियों को सिंधु सभ्यता का निर्माता नहीं मानते हैं । इसका कारण दोनों संस्कृतियों के बीच आधारभूत अंतर को बताए हैं  :- 
पहला => " लिपि में भिन्नता "  सुमेरवासी कीलाक्षर लिपि का प्रयोग करते थे जबकि सिन्धुवासीयों की लिपि सम्भवतः चित्रलिपि या सांकेतिक लिपि थी ।
 दूसरा => मेसोपोटामिया में मंदिर महत्वपूर्ण स्थान रखते थे लेकिन इस क्षेत्र के उत्खनन में मंदिर का कोई प्रमाण नहीं है । सुमेरवासिय भवनों के निर्माण में कच्ची ईंटों का व्यवहार करते थे । जबकि सिंधुघाटी के निवासिय पक्की ईंटों का ।  कुछ अन्य विद्वान सिंधु सभ्यता का मूल ईरानी बलूची संस्कृति को मानते हैं । इसका तर्क यह दिया गया है कि हड़प्पा सभ्यता बलूच संस्कृतियों  के भार्तीकरण का परिणाम स्वरूप विकास कर उत्कर्ष तक पहुंची है । 
" श्री अमलानन्द घोस " का कहना है कि भारतीय ही सिंधु सभ्यता के निर्माता थे ।
" प्रो० एस० आर ०राव ० " का मत है कि - इस सभ्यता का विकास सिंधु की स्थानीय संस्थाओं द्वारा धीरे-धीरे हुआ। आर्थिक समृद्धि के लिए सिंधु घाटी के निवासियों ने व्यापारिक संबंध स्थापित किए और विभिन्न क्षेत्रों में मानकीकरण किया ।
 कुछ इतिहासकारों का मत है कि सिंधु सभ्यता के निर्माता आर्य थे । वहीं "सर जॉन मार्शल" का मत है कि '  'सिंधु तथा आर्य सभ्यता के निर्माता , इन सभ्यताओं की  की विषमताओं के कारण किसी भी दशा में एक नहीं हो सकते । ' 
डॉ राखल दास बनर्जी तथा कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि सिंधु सभ्यता के निर्माता द्रविड़ लोग थे ।
       सिंधु सभ्यता से संबंधित विभिन्न स्थलों की खुदाई में प्राप्त अस्थिपंजरो और प्रतिमा - मस्तकों के वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इस सभ्यता के निर्माता मिश्रित जाति के थे । हड़प्पा मोहनजोदड़ो से प्राप्त चित्रों के परीक्षण से ज्ञात होता है कि सिंधु प्रदेश में अनेक प्रजाति प्रोटो - आस्ट्रेलाइड   ,भूमध्यसागरीय , मंगोलियन और अल्पाइन के लोग रहते थे । इससे यह प्रमाणित होता है कि यहां पर भिन्न प्रजातियों के लोग रहते थे ।

सिंधु सभ्यता की मौलिक विशेषताएं

# कांस्य सभ्यता = सिंधु सभ्यता को कांस्य सभ्यता भी कहा जाता है ।इसका कारण है उस कार्यक्रम में का कांस्य की प्रधानता तथा वृहद पैमाने पर कांसे की प्रधानता तथा वृहत पैमाने पर काँसे के औजारों और अन्य वस्तुओं का निर्माण होना । 
# नागरिक सभ्यता = सिंधु सभ्यता एक नगरिक सभ्यता थी । साधारण नागरिकों की सुख सुविधा का ध्यान दिया जाता था | इसके कई प्रमाण उपलब्ध है जैसे विशाल नगर सुव्यवस्थित राजमार्गो ,  पक्के भवनों , सार्वजनिक स्नानागार आदि का निर्माण नागरिकों की सुविधा के लिए किया गया था । 
# जनतांत्रिक सभ्यता =  सिंधु प्रदेश में राजा , राज प्रसाद और शाही खजाने का कोई प्रमाण नहीं मिला है ।शासन के दो प्रधान केन्द्र थे । हड़प्पा और मोहनजोदड़ो  की केंद्रीय शक्ति विकेंद्रित होते हुए भी शासन व्यवस्था व्यवस्थित  थी।पदाधिकारी नागरिकों के सहयोग से शासन करते थे ।
#औद्योगिक सभ्यता = सिंधु सभ्यता के निवासियों के आर्थिक जीवन का आधार व्यापार और उद्योग धंधा था । उनका व्यापार दूर-दूर के देशों के साथ होता था आर्थिक जीवन औद्योगिक विशिष्ट करण और स्थानीयकरण पर आधारित था ।
# शांति मूलक सभ्यता  = सिंधु सभ्यता के निवासी शांतिप्रिय थे । उत्खनन में जितने भी उपकरण मिले हैं उन से प्रतीत होता है कि इनका प्रयोग आखेट तथा आत्मरक्षा के लिए किया जाता होगा ।
# सुव्यवस्थित धार्मिक जीवन = सिंधु घाटी के निवासियों का धार्मिक जीवन सुव्यवस्थित था ।उनका धर्म मूलतः  द्विदेवतावादि था  वे पुरुष तथा नारी को ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति का प्रतीक मानते थे ।
#लेखन कला तथा माप तोल का ज्ञान = सिंधु घाटी के निवासी लेखन कला अंकों की गणना एवं माप तोल के साधनों से परिचित थे । सिंधुलिपि चित्रलिपि थी । ये लिपि दाएं से बाएं लिखी जाती थी ।
#  समष्टिवादिनी सभ्यता = यह सभ्यता समष्टिवादिनी थी । इस सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त विशाल सभाभवन विशाल भोजनालय एवं सार्वजनिक जीवन से संबंधित सामग्री थी । यह सभी सर्वश्रेष्ठ  सामूहिक जीवन के द्योतक  है ।
* लिपि  ->प्राचीन मेसोपोटामिया की तरह सिंधु घाटी के निवासियों ने भी लेखन का आविष्कार किया था । उत्खनन से लिपिबद्ध मुहरे तथा ताम्र प्राप्त हुए हैं ।अभी तक लगभग 2000 मुहावरे  प्राप्त हुई है । अधिकांश मुहरों पर लघु लेख  उप्कृर्ण है ।अभी तक लिपियों पर उत्कृर्ण लेखों को संतोषप्रद ढंग से पढ़ा नहीं जा सका है । लेकिन फिर भी इतना मान लिया गया है कि लिपि दाएं से बाएं की तरफ लिखी जाती थी |अधिकांश अभिलेख पर उत्कीर्ण लेख छोटे हैं तथा उन पर चंद लिपि - संकेत ही अंकित है ।अभी तक लगभग 250 -400 लिपि संकेत पहचाने गए हैं । प्रत्येक चित्र संकेत किसी ध्वनि ,वस्तु या विचार का द्योतक है । सिंधु लिपि वर्णमालात्मक नहीं बल्कि भावचित्रात्मक है ।

नगर निर्माण योजना    =>  हड़प्पा संस्कृति एक नगर      संस्कृति थी। इस संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर योजना प्रणाली थी । हड़प्पा मोहनजोदड़ो तथा दूसरे स्थलों में जिस तरह का नगर विन्यास मिला है उसे स्पष्ट होता है कि नगरों का निर्माण और विस्तार वास्तु विशारदो की निश्चित योजना एवं श्रेष्ठ व्यवस्था के आधार पर होता था । इस सभ्यता के नगर विश्व के प्राचीनतम सुनियोजित नगर में से हैं ।
* इस सभ्यता के उत्खनन से हमें दो स्तरीय नगरों के निर्माण के प्रमाण मिले हैं -  दुर्ग और निचला शहर । दुर्ग में शासक का निवास स्थान था । निचले शहर में आवासीय भवन थे ।
* हड़प्पा , मोहनजोदड़ो ,कालीबंगा ,लोथल सुतकोटड़ा  आदि जगहों में गढ़ी तथा निचले शहरों के प्रमाण उपलब्ध हुए हैं ।

मकान   => हड़प्पा सभ्यता के उत्खनन से जो अवशेष मिले हैं उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मकानों के निर्माण में सादगी तथा उपयोगिता पर अधिक ध्यान दिया जाता था ।उनके भवनों में ना अलंकरण मिलता है और ना ही विविधता |मकानों के अवशेष से स्पष्ट हो जाता है कि भवन निर्माण योजनाबद्ध तरीके से होता था । सड़कों के दोनों और कतारों में भव्य भवन थे । सिंधुघाटीवासी पक्की ईंटो का प्रयोग बड़े पैमाने पर करते थे । मकान कई मंजिलों के होते थे ।जिनमें ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां होती थी । 
० प्रत्येक घर में आंगन ,पाकशाला ,स्नानग्रृह ,  नालियां तथा कुंए होते थे ।मकान में हवा और रोशनी के लिए झरोखे बनाए जाते थे । खिड़कियां घर के आंगन की ओर खुलती थी । 
० हड़प्पा सभ्यता में टोडा मेहराब का प्रयोग मिलता है । मोहनजोदड़ो के निचले नगर के कुछ मकानों में संडास बनाए गए थे ।
० हड़प्पा मोहनजोदड़ो में दो प्रकार के मकान मिले हैं । इससे अनुमान लगाया जाता है कि बड़े घरों में अमीर रहते थे और छोटे मकान समाज के गरीबों के थे ।

मजदूरों के मोहल्ले => कुछ ऐसे भी मकान मिले हैं जो संभवत मजदूरों के मुहल्ले थे । हड़प्पा में ऐसे 2 कमरे वाले  14 मकान मिले हैं । मोहनजोदड़ो में सोल 16 , चन्हुदडों में भी ऐसी मजदूरों की बस्ती मिली है । ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि इन वस्तुओं में ऐसे मजदूर रहते होंगे जो गुलामों का काम करते थे । इन मकानों की लंबाई चौड़ाई 20 फीट * 12 फीट है |
सड़क => लोथल कालीबंगा में सड़कों के प्रमाण मिले हैं । सड़कों का निर्माण योजनानुसार होता था । सड़के एक दूसरे को समकोण पर काटती थी और नगर को आयताकार खंडों में बाटती थी । सड़के उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम जाती थी ।बड़ी सड़कों की चौड़ाई 30 फीट तक होती थी । सड़कों का संबंध गलियों से था । गलियां भी 7 फीट तक चौड़ी होती थी । नालियों की सफाई व्यवस्था भी बहुत ही उत्तम तरह से की गई थी ।

नालियों की व्यवस्था  => "गार्डन चाइल्ड ने जल निकास प्रणाली की प्रशंसा करते हुए कहा है कि " गलियों की सुंदर पंक्तियां और नालियों का उत्तम प्रबंध तथा उनकी सतत स्वच्छता संकेत देती है कि कोई नियमित नगर  शासन था और वह अपना काम सावधानी से करता था । 
 स्नानागार => उत्खनन में जितने भी भवनों के अवशेष मिले हैं उसमें मोहनजोदड़ो के दुर्ग का विशाल स्नानागार सबसे महत्वपूर्ण है । यह आयाताकार  तालाब  30 फीट लंबा 23 फीट चौड़ा और 8 फीट गहरा है । इसकी सुदृढ बनावट इसका पक्का फर्श ,सीढ़ियाँ और पानी निकास की चौड़ी नालियां तत्कालीन वास्तुकला की सफलता प्रमाणित करता है । सम्भवतः इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों के लिए होता था ।
 सार्वजनिक भवन => मोहनजोदड़ो में एक विशाल भवन के अवशेष मिले हैं । जिसकी लंबाई 230 फीट और चौड़ाई 78 फीट थी । दो विशाल आंगन , भण्डारगृह और भृत्यकक्ष  से सुसज्जित यह भवन शानदार है । सम्भवतः सार्वजनिक भवन धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन का केंद्र था ।     
        मोहनजोदड़ो में सड़क के किनारे कहीं-कहीं सार्वजनिक भोजनालयों के अवशेष भी मिले हैं । हड़प्पा में धन्यागारो के अवशेष मिले हैं | जो 50 फीट लंबा और 20 फीट चौड़ा है । कालीबंगा में एक दुर्ग मिला है । लोथल मे एक विशाल चबूतरा सड़क और मकानों का पता  चला है ।योजनाबद्ध मकानों का पता चला है ।

 हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो , लोथल , चन्हुदडों कालीबंगा में अनेक अन्नागार खुदाई में मिले हैं ।
सिंधु घाटी के लोगों का व्यापारी वर्ग समृद्ध था ।
प्रत्येक नगर में निवासियों की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बाजार था ।मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा में सड़कों के किनारे कुछ खुदरा दुकानों के अवशेष मिले हैं ।

किलाबंदी => नगरों की सुरक्षा के लिए दीवारों से घेर दिया जाता था । दीवारें  कच्ची ईटों की बनी होती थी । लेकिन बाहर से उन्हें  पक्की ईंटो से मजबूत बनाया जाता था ।किले की दीवार 40 फीट चौड़ी और 36 फीट ऊंची थी ।
आर्थिक जीवन  => हडप्पा कालीन लोगों की आर्थिक स्थिति संतोषजनक  थी । खुदाई मे समृद्ध  गाँवो और नगरों के अवशेष मिले हैं । सिंधु घाटी की अर्थव्यवस्था सिंचित कृषि पशुपालन विभिन्न दस्तकारिर्यों में दक्षता  और समृद्ध आन्तरिक और बाह व्यापार पर आधारित थी ।
कृषि => सिंधु नदी की घाटी उपजाऊ थी । शहर के निवासियों की जीविका आसपास के लोगों के गावों के किसानों की खेती से चलती थी । सैन्धव लोगों का मुख्य पेशा कृषि कार्य था ।यहां के निवासी गेहूं  , जौ ,मटर ,तिल ,सरसों की खेती करते थे |
० लोथल और रंगपुर में मृत पात्रों में लिपटे हुए चौकर तथा अन्न के दाने मिले हैं । 
० सौराष्ट्र में बाजरा की खेती होती थी । 
० सिंधु घाटी के निवासी कपास पैदा करने  सबसे पुराने लोगों में से थे ।
० लोथल में अनाज पीसने के लिए चक्की और कूटने के उखल का प्रयोग होता था ।
०हड़प्पा संस्कृति में खेती के लिए संभवत हल का प्रयोग नहीं होता था । उसकी जगह पर उनकी खेती में फावडे  पर आधारित थी ।
० कालीबंगा में हल द्वारा खेत जोतने के प्रमाण मिले हैं ।

 पशुपालन  => सिंधु - सभ्यता के लोग पशु भी पालते थे बैल ,भैंस , बकरी ' भेड़ और सूअर उनके पालतू पशु थे । * हड़प्पा में एक मूर्त्ति में कुत्ते को मुंह में एक खरगोश पकड़े हुए दिखाया गया है ।
*घोड़े के अवशेष गुजरात के सूरकोतड़ा नामक स्थान से मिला है ।
* हड़प्पा के लोग हाथी से भी परिचित थे ।
* पशु के साथ-साथ यहां के निवासी हॅस , बत्तख,खरगोश ,बंदर , हरिण ,मुर्गी और तोता भी पालते थे ।
*बत्तख का चित्र लोथल के बर्तनों पर मिलता है । मोर का भी चित्रण बर्तनों पर किया जाता था ।
*जंगली पशुओं में से सिंह , भालू , गैंडा , भैंस आदि के ह के चित्र खिलौनों और महलों पर मिले हैं ।
उद्योग -धंधा => सिंधु सभ्यता में कृषि और पशुपालन के अलावा अन्य छोटी-छोटी दस्तकारियों के भी प्रमाण मिले हैं ।
 ० यहाँ के निवासी पत्थर के औजारों का इस्तेमाल करते थे । वे कांस से परिचित थे । टीन और ताँबा मिलाकर  काँसा  तैयार किया जाता था |
० कांसे  का उपयोग घरेलू बर्तन विविध प्रकार के औजार और हथियार बनाने में होता था ।तांबा का उपयोग भी कुल्हाड़ीयाँ , छेनियां , छुरियाँ ,तीर आरियाँ आदि बनाने में किया जाता था ।
० सिंधु सभ्यता के निवासी सोना चांदी और कीमती पत्थरों के आभूषणों का उपयोग करते थे ।
० मछली पकड़ना सिंधु प्रदेश के निवासियों का एक प्रमुख उद्योग था ।तांबे के बने मछली पकड़ने के कांटे भी मिले हैं ।
०भोजन में मछली तथा कछुए की मांस का भी प्रयोग होता था ।
०हड़प्पा मोहनजोदड़ो और लोथल की खुदाई में तरह-तरह के कछुओं की हड्डियां मिली है ।

धातु निर्माण कला के अतिरिक्त यहां के निवासियों को अन्य कलाओं और तकनीकों का भी ज्ञान था ।

. मनका बनाने का व्यवसाय बहुत उन्नत था । सोना , चांदी ,पत्थर और चिकनी मिट्टी से मनका बनाए जाते थे ।

 . नाव बनाने की कला में भी वे लोग प्रवीण थे ।
 वस्त्र - उद्योग भी उन्नत अवस्था में था । मोहनजोदड़ो ,लोथल रंगपुर और कालीबंगा में इसके प्रमाण मिले हैं ।
. कताई के लिए तकली का इस्तेमाल होता था ।सूत काटने के चरखे भी मिले हैं ।
. कुम्हार चाक की सहायता से बर्तन बनाते थे |बर्तनों पर चित्र अंकित किए जाते थे ।बर्तनों को चिकना और चमकाया जाता था । बर्तनों पर शीशों का उपयोग कर चमकाया जाता था ।
. हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में विशाल इमारतों के अवशेष मिले हैं । इससे पता चलता है कि राजगिरी एक महत्वपूर्ण कौशल थी ।
कला और शिल्प => मोहनजोदड़ो की सबसे प्रसिद्ध कलाकृति वहां से प्राप्त एक नृत्य की मुद्रा में नम्न स्त्री की कांस्य प्रतिमा है ।कलाकृतियों के निर्माण के लिए धातु एवं पत्थर का उपयोग कम होता था ।
         अन्य प्रसिद्ध कलाकृतियां -> हड़प्पा और  चन्हूदडों से प्राप्त काँसे की गाड़ियां ,मोहनजोदड़ो से प्राप्त दाढ़ी वाले सिर की पत्थर की मूर्ति , स्वास्तिक चिन्ह , मोहनजोदड़ो से प्राप्त हाथी दांत पर मानव चित्र ।
हड़प्पा सभ्यता से पक्की मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं ' बर्तनों पर वनस्पति का चित्रांकन पशुओं की अपेक्षा ज्यादा है । मिट्टी के बर्तन में एकरूपता है ।ये बर्तन सादे हैं और उन पर लाल मिट्टी के साथ-साथ काले रंग की चित्रकारी मिलती है ।बर्तनों पर मुद्रा के निशान भी हैं । इससे ज्ञात होता है कि बर्तनों का भी व्यापार होता था ।
व्यापार => हड़प्पा और मोहनजोदड़ो प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र थे । व्यापार जलमार्ग तथा स्थल मार्ग दोनों से होता था ।सुमेर , एलम , क्रीट ,  मिश्र आदि देशों से उनका व्यापारिक संबंध था ।                                       व्यापार का मुख्य साधन नाव ,ऊंट और बैलगाड़ी था । नाव का प्रमाण मोहनजोदड़ो लोथल में मिला है । लोथल में नाव के 5 मॉडल मिले हैं वहीं से प्राप्त मृत्य भांडुप के टुकड़े पर भी नाव के चित्र मिले हैं ।
सड़कों के दोनों किनारों पर दुकानें लगती थी ।मार्लो का आयात निर्यात निर्यात होता था । 

 सिंधुकाल में विदेशी व्यापार 

आयातित वस्तुएं         प्रदेश
  तांबा  - खेतड़ी ,बलूचिस्तान , ओमान 
चांदी - अफगानिस्तान , ईरान
 सोना - कर्नाटक ,अफगानिस्तान ,ईरान 
 टिन -अफगानिस्तान , ईरान 
 गोमेद - सौराष्ट्र 
लाजवर्त -मेसोपोटामिया
 शीशा - ईरान

व्यापारी अपनी मुहरें  रखते थे । हाथी दांत और मिट्टी के मुहरें बनती थी । मुहरों का आकार विविध प्रकार का होता था ।ज्यादातर वे वर्गा कार होती थी ।
.नापतोल के लिए तराजू तथा बटखरे का उपयोग होता था ।
. नापतोल में 16 को इकाई माना जाता था  । इतिहासकारों का मत है कि सिंधु घाटी के बटखरे एलम एवं मेसोपोटामिया के बटखरों  से तौल की सच्चाई तथा एकरूपता में कहीं अधिक सही थी ।
 स्लेटी पत्थर के बने कई छोटे-बड़े बटखरे मिले हैं । निर्धन पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़ों से ही तौल का काम लेते थे । हुणडी तथा साख की प्रथा भी प्रचलित थी ।
मोहनजोदड़ो से सीप का बना मापदंड और लोथल से हाथी दांत का बना एक पैमाना मिला है । नापतोल तथा मूल्य के संबंध में संभवत राज्य का कुछ नियंत्रण रहता था । "सर जॉन मार्शल का कहना है कि -सिंधु घाटी का साधारण नागरिक सुविधा तथा विलास का जिस मात्रा में उपयोग करता था उसकी तुलना उस समय के सभ्य संसार के दूसरे भागों से नहीं की जा सकती है।

 सामाजिक जीवन 

 समाज की रचना => सिंधु सभ्यता के निवासियों के सामाजिक संगठन की कल्पना हम दोनों के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों के आधार पर कर सकते हैं ।
० समाज में वर्ण व्यवस्था नहीं थी । लेकिन वर्ण विभेद से इनकार नहीं किया जा सकता है ।
 ०मोहनजोदड़ो हड़प्पा एवं चंहुदड़ों के उत्खनन में दो प्रकार के मकान मिले हैं । धनियों के और गरीबों के । दुर्ग के साथ मजदूरों के मोहल्ले भी मिले हैं ।
० समाज की इकाई परिवार थी ।परिवार का ढांचा पितृसत्तात्मक था  या मातृसत्तात्मक इस संबंध में निश्चित प्रमाण नहीं है । लेकिन फिर भी ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि समाज का ढांचा मातृसत्तात्मक था ।इसका कारण है उत्खनन में स्त्री  मृण्मूर्तियों का अधिक संख्या में मिलना । 
० समाज में विभिन्न पेशे के लोग रहते थे । जैसे पुरोहित राजकीय कर्मचारी , पदाधिकारी , वैद्य, व्यवसायी , व्यापारी , ज्योतिषी ,जादूगर , कुम्हार ,धातुकार ,बढ़ई , सुनार ,बुनकर , रंगरेज ,लोहार, कृषक आदि ।
० व्यवसाय के आधार पर समाज को 4 वर्गों में विभाजित किया जा सकता है । 
०विद्वान वर्ग => इस वर्ग में पुरोहित ज्योतिषी तथा वैध थे । 
० योद्धा तथा राजकीय =>  योद्धा सुरक्षा का कार्य करते थे और राजकीय अधिकारी प्रशासन में संलग्न रहते थे ।
० व्यवसाई वर्ग => इसमें व्यापारी तथा उद्योगपति थे ।
॰ श्रमजीवी वर्ग => इसमें नौकरों ,मजदूरों , गुलामों , किसानों और मजदूरी करके जीवन निर्वाह करने वाले लोग रहते थे ।                                                               वर्ग विभेद को देखते हुए कहा जा सकता है कि समाज में आर्थिक विषमता थी लेकिन इसके बावजूद वर्ग संघर्ष का कोई प्रमाण नहीं मिला है ।
सिंधु प्रदेश के निवासियों का सामाजिक जीवन सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था ।सिंधु सभ्यता के सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं का परिचय इस प्रकार दे सकते हैं । 
०भोजन :- सिंधु सभ्यता के निवासियों शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों ही प्रकार का भोजन करते थे ।मांसाहार में जहां सुअर , गाय , भेड़ तथा दूसरे जानवरों के मांस के साथ-साथ मछलियां तथा कछुए भी खाए जाते थे । मांस काटने के लिए पत्थर के औजारों का उपयोग किया जाता था । भोजन में फलों को भी स्थान दिया गया था ।इसके साथ ही वह तरबूज ,नींबू ,दाल ,सब्जी ,दूध , घी , मिठाई , छुहारा , रोटी का उपयोग भोजन में करते थे ।
० बर्तन :- कुम्हार चाक पर बरतन बनाते थे । उत्खनन में भी तरह-तरह के बरतनों के अवशेष मिले हैं । जिनसे पता चलता है उस समय मिट्टी के साथ-साथ तांबे और कांसे का भी उपयोग बर्तन बनाने में किया जाता था ।मिट्टी के पात्रों में जैसे कटोरे ,कलश , सुराही आदि के अवशेष मिले हैं ।इन मिट्टी के पात्रों  पर वृक्षों , पुष्पों तथा पत्तियों से अलंकृत किया जाता था । बर्तनों को रंगों से रंग कर सुंदर बनाया जाता था ।
०औषधि :- सिंधु घाटी के लोग औषधियों का प्रयोग करना जानते थे । आबूनस की तरह का एक काला पत्थर मिला है जिसे पानी में घोल देने से पानी का रंग बदामी हो जाता था । पुरातत्ववेताओं का मानना है कि यह शिलाजीत है और इसका प्रयोग औषधि के रूप में होता था ।हड्डीयों के चूरा का औषधीय उपयोग किया जाता था । इसके साथ हरिण और गैंडे के सीग का भी औषधि के रूप में उपयोग होता था । नीम की पती और मूंगा का भी दवा के रुप में उपयोग होता था। साथ ही समुद्रफेन का भी उपयोग औषधि के रुप मे होता था। 
वेश भूषा :- हड़प्पा मोहनजोदड़ो के निवासियों द्वारा पहने जाने वाले वस्त्र का अनुमान वहां के  उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से अनुमान लगाया जाता है कि स्त्री और पुरुषों के वस्त्र में कुछ अंश में समानताएं थी । वस्तुओं का उपयोग ऋतु के अनुसार होता था ।वहीं धनी और गरीब लोगों के वस्त्रों में भी फर्क था । मोहनजोदड़ो के खंडहरों में बहुत सी सुइयाँ मिली है इससे अनुमान लगाया जाता है कि लोग सिला हुआ वस्त्र पहनते थे ।एक पुरुष मूर्ति के शरीर पर लंबी चादर पाई गई है ।जिसे वह बाएं कंधे के ऊपर और दाहिनी भुजा के नीचे फेंककर पहने हुए हैं ।कुछ स्त्री मूर्तियां पगड़ी भी पहनी है ।स्त्री पुरुष दोनों टोपियों का व्यवहार करते थे । डॉ० मैके का अनुमान है कि यह दुपट्टा शायद किसी पद के अधिकार का अथवा किसी धर्म विशेष का घोतक है ।                                   स्त्रियाँ जो साड़ी पहनती थी उन्हें साड़ी न कहकर अधोवस्त्र कहना अधिक उपयुक्त होगा । नारियां कमर में मेखला का व्यवहार करती थी । डॉ० मैके का अनुमान है कि शरीर रक्षा के अतिरिक्त प्रसाधन के रूप में इसका व्यवहार होता था । स्त्रियां सिर पर एक विशेष प्रकार का परिधान धारण करती थी जो पंखे की भांति पीछे की और उठा रहता था ।
* मनोरंजन के साधन = संगीत , नृत्य, खेल -कूद, पशु - युद्ध , गेंद , गोली , चौपड़ , पासा तथा शतरंज आमोद -  प्रमोद के मुख्य साधन थे । मिट्टी और पत्थर का बना हुआ पासा पर्याप्त संख्या में मोहनजोदड़ो में मिला है 'हड़प्पा में 7 पासे मिले है :चार मिट्टी की , दो पत्थर के और एक कांचली मिट्टी की । मिट्टी और हाथी दांत के भी पासे बनाए जाते थे ।पक्षी और जानवरों का शिकार करना भी लोगों के मनोरंजन का साधन था । मछली फँसाना भी उन लोगों के मनोरंजन के साधन थे  तथा पशु - पक्षी को लड़ाना भी उनके आमोद प्रमोद का एक अंग था ।घर में चिड़िया  जाती थी और उन्हें लड़ा कर अपना मन बहला लेते थे ।गोलियों का भी खेल प्रचलित था ।घर में चिड़िया भी पाली जाती थी । बच्चों के मनोरंजन पर भी ध्यान दिया जाता था । मिट्टी के पशु - पक्षी , पुरुष -स्त्री ,गाड़ी , झुनझुना और सीटियां बड़ी संख्या में उत्खनन में मिले हैं । मिट्टी की बनी कुर्सी के छोटे-छोटे मॉडल मिले हैं । हड़प्पा मोहनजोदड़ो में मिट्टी के तराजू मिले हैं । जिनसे बच्चे खेला करते होंगे । उस समय इक्के का भी काफी प्रयोग होता था ।एक बैल जैसा खिलौना मिला है जिसका सिर हिलता है एक हाथी है जिसका सिर दबाने से शब्द निकलते हैं । सीटियाँ भी बड़ी संख्या में उत्खनन में मिली हैं ।
श्रृंगार -प्रसाधन :-केश विन्यास में सिंधु सभ्यता के निवासी अहितीय थे । केश विन्यास से संबंधित कंघी और शीशा भी मिला हैं ।तांबे और कांस के उस्तरे मिले हैं जिनसे हजामत बनायी जाती थी । सिंधु प्रदेश की नारियां सौंदर्य के लिए काजल , पाउडर ,सिन्दूर , अलक्तक ( ओठ रंगने के उपयोग में ) तेल आदि प्रसाधनों का प्रयोग करती थी ।
आभूषण : सिंधु सभ्यता के निवासी आभूषणों के प्रेमी होते थे।  सभी वर्गों के लोग आभूषणों का प्रयोग करते थे स्त्री-पुरुष दोनों के द्वारा आभूषणों का प्रयोग किया जाता था ।आभूषण सोना ,चांदी , हाथी - दाँत ,बहुमूल्य रत्न , तांबा , मूँगा ,पक्की मिट्टी के बनाए जाते थे । हीरा , पन्ना , लाल पत्थर आदि  से भी आभूषण बनाए जाते थे ।  आभूषणों में हार , बाजूबंद , अंगूठियां , कड़ा और चूड़ियां पुरुष - स्त्री दोनों पहनते थे । इनमें 17,20 ,48 ,53 मनकों का प्रयोग हारों में हुआ है ।गरीब मिट्टी के आभूषण पहनते थे । खुदाई में हाथी - दांत की कंधी और ओठ रँगने के साधन , काँसे के दर्पण मिले हैं । मोहनजोदड़ो से मिट्टी , शंख और सेलखड़ी की बनी चूड़ियां मिली है । स्त्रियां कर्धनी और पाद -भूषण भी पहनती थी ।उत्खनन से प्राप्त मृणमूर्तियों के हाथों में तीन ,चार या पांच चूड़ियां हैं ।  
 स्त्रियों की दशा = उत्खनन में प्राप्त अवशेषों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक था।सिंधु सभ्यता के निवासी अनेल देवियों की पूजा करते थे । परंपरागत परिवार ही समाज की ईकाई था। समाज में स्त्रियों को विशेष सम्मान मिलता था । माता के रूप में नारी का स्थान बड़ा ही आदरणीय थी । समाज में पर्दा - प्रथा नहीं थी। स्त्रियाँ विलासप्रिय होती थी । धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भाग लेते थे । 
अस्त्र-शस्त्र = तांबे ,कांसे , पीतल से बने हुए कई अस्त्र शस्त्रों के नमूने मोहनजोदड़ो के खंडहरों में मिले हैं । उनकी बनावट देखकर ऐसा लगता है कि इसका प्रयोग युद्ध में नहीं किया जाता था बल्कि इसका उपयोग अपनी सुरक्षा के लिए किया जाता था । बर्छा , छेनी , कुठार , फरसा इत्यादि से लोहार और बढ़ई अपना काम करते थे । आरी से भी काम लिया जाता था । 
 मृतक संस्कार = सिंधु प्रदेश में मुख्यतः तीन प्रकार के मृतक संस्कारों के प्रमाण मिले हैं :
 i)पुर्ण समाधि : - इस प्रथा के अनुसार मृतक के शरीर को ज्यों -का -त्यों मिट्टी में गाड़ दिया जाता था । मृतकों के साथ आवश्यकता की वस्तुएं भी समाधि में साथ में रखी जाती थी ।
२) अर्द्‌ध समाधि :- इसके अंतर्गत पहले शव को खुला छोड़ दिया जाता था और पशु - पक्षियों के खा चुकने के बाद शेष भाग को मिट्टी में गाड़ दिया जाता था ।
३) दाह कर्म :- इसमें शव का अग्नि संस्कार कर दिया जाता था और फिर उसके भस्म को मिट्टी में गाड़ दिया जाता था ।             
              मृतक संस्कारों को देखते हुए कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता के निवासी आगामी जन्म में विश्वास करते थे । हड़प्पा में शव को दफनाने की और मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा प्रचलित थी । मोहनजोदड़ो में राख मेरा और हड्डी के भरे हुए कलश मिले हैं ।
राजनीतिक संगठन :- हड़प्पा सभ्यता के राजनीतिक संगठन के  संबध में कोई निश्चित मत नहीं दिया जा सकता है लेकिन फिर भी कई इतिहासकारों में इस संबंध में काफी मतभेद है ।जहां प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता "मर्टिमर ह्वीलर "का मत है कि सुमेर और अक्काद की तरह सिंधु प्रदेश में भी पुरोहित राजा का शासन था । व्हीलर के विचार सर्वमान्य  नहीं है । 
वहीं कुछ इतिहासकारों का मत है कि हड़प्पा के निवासी युद्ध की अपेक्षा व्यापार में अधिक रूचि रखते थे इसलिए नगरों पर संभवत व्यापारी वर्ग का शासन था ।
 " हंटर "का विचार है कि सिंधु प्रदेश में जनतांत्रात्मक सरकार थी और संभवत सांसदों के द्वारा ही तत्कालीन नगरीय व्यवस्था का संचालन होता था ।
 मैके का कहना है मोहनजोदड़ो की शासन की देखरेख नगरपाल करता था । प्रशासन की सुविधा के लिए जगर को कई भागों में बांट दिया गया था और प्रत्येक भाग के लिए रक्षक की नियुक्ति की जाती थी । निश्चित साथ्यों के अभाव में तथा  सिंधु सभ्यता की नगर योजना को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां नगरपालिका जैसी कोई संस्था अवश्य रही होगी जो सार्वजनिक हित के लिए के लिए बहुत ही मुस्तैदी से कार्य करती थी। शायद वहाँ नगरपालिका शासन की व्यवस्था की गई थी । कुछ इतिहासकारों का मत है कि सिंधु सभ्यता चार सौ मील के क्षेत्र में फैली हुई थी यातायात के साधनों से शासन संचालन असंम्भव था । इसलिए शासन की सुविधा के लिए दो राजधानीयों की व्यवस्था की गई थी । हड़प्पा उत्तरी साम्राज्य की राजधानी थी और मोहनजोदड़ो दक्षिणी साम्राज्य की।हड़प्पा और मोहनजोदड़ो  में एक -एक दुर्ग के अवशेष मिले हैं ।दुर्गों का निर्माण ऊंचे टीलों पर होता था ।जिनमें संभवत राजधानियों के उच्च अधिकारी रहते होंगे । 

धर्म और धार्मिक विश्वास जीवन :-प्राचीन सभ्यताओं के निवासियों बहुदेववादी , प्रकृति पूजक और शक्ति के उपासक थे । एकेश्वरवाद की कल्पना कालांतर में उत्पन्न हुई है उसी प्रकार हम पाते हैं  सिंधु सभ्यता के निवासि भी अनेक देवी - देवताओं की पूजा अर्चना करते थे । उत्खनन में कोई भी मंदिर का अवशेष नहीं मिला है इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि शायद वे लोग प्रकृति के उपासक रहे होंगे ।उत्खनन से प्राप्त मुहरों ,ताबीजों और मूर्तियों से सिंधु सभ्यता के निवासियों का धर्म का ज्ञान हमें होता है । उत्खनन से प्राप्त मुहरो और मूर्तियों से उनके धर्म  के ब्राह्म रूप का ज्ञान होता है ।
मातृ देवी की पूजा :- मोहनजोदड़ो हड़प्पा चन्हूदरो आदि स्थानों की खुदाई में मिट्टी के अनेक नारी मूर्तियां मिले हैं यह नारी मूर्तियां सृष्टि करते और वनस्पति के अधिष्ठाता के रूप में दिखलाए गई है यह देवी मूर्तियां आभूषणों से लदी हुई है कुछ माथे देवी की मूर्तियां शिशु को स्तनपान कराती हुई पाई गई हैं पूजा से ही मात्र देवी की पूजा की उत्पत्ति हुई है संभवत इसी से आगे चलकर भारत में शक्ति पूजा की  प्रथा चल पड़ी ।
शिवपूजा :- .खुदाई में देवी की मूर्ति के साथ-साथ एक मुहर पर एक पुरुष देवता का भी चित्र मिला है यह देवता योग मुद्रा में बैठा हुआ और उसके चारों ओर एक हाथी , एक बाघ , एक गैंडा तथा एक  भैंस  है उसके  सामने के नीचे दो हिरण भी है । "मार्शल " ने इसे हिंदूकालीन शिव का प्राचीन रूप माना है ।कुछ लोग इसे पशुपति महादेव की आकृति मानते हैं ।सिंधु सभ्यता के निवासी शिव की उपासना करते थे ।
लिंग और योनि की पूजा :-हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो , लोथल इत्यादि स्थानों से बहुसंख्यक लिंग  के समान आकृतियां प्राप्त हुई हैं। जिससे प्रतीत होता है कि यहां के लोग लिंग की पूजा करते थे।
वृक्ष पूजा :-मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर में दो जुड़वा पशुओं के सिरों पर पीपल की पत्तियां दिखाई गई है ।एक अन्य मुहर में पीपल की डालों के बीच एक देवता का चित्र है जिसकी आराधना सात स्त्री मूर्तियां कर रही हैं । अन्य मुहरो में पशुओं और सर्पों द्वारा वृक्ष की रक्षा का चित्र अंकित है ।इससे स्पष्ट होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी वृक्ष की भी पूजा करते थे ।पीपल के पेड़ अधिक पवित्र माने जाते थे ।
पशु की पूजा :-मुद्रा में अंकित पशु चित्रों से सिंधु प्रदेश में पशुओं के धार्मिक महत्व का आभास होता है |पशुपति महादेव के चारों और जो जानवर हैं वे भी इस बात के द्योतक हैं ।मार्शल ने पशु पूजा को तीन भागों में विभाजित किया है i) दंती पशुओं की पूजा २) कुछ ऐसे दंती पशु जिनकी उत्पत्ति और जिन का महत्व विशेष रूप से ज्ञात नहीं है ।३)  वास्तविक पशुओं की पूजा वास्तविक पशुओं में बैल , भैसा, हाथी, गैंडा, बाघ आदि पशुओं का धार्मिक महत्व था। सबसे प्रमुख पशु कूबड़वाला साँढ़ था । कुछ जानवर देवता के वाहन माने जाते थे ।
नाग पूजा :-सिंधु सभ्यता में नाग का भी धार्मिक महत्व था। मिट्टी के बर्तनों पर साँप का कुछ चित्रण है । लोथल के तीन मृदभण्ड के टुकड़ों पर प्रत्येक पर दो सर्प बने मिले हैं ।
जल पूजा :- सिंधु प्रदेश के निवासी नदी की उपासना भी करते थे ।नदी से कृषि और यातायात में सुविधा होती थी इसीलिए लोग नदी की पूजा करते थे ।

सूर्य की पूजा :-सिंधु सभ्यता के निवासी सूर्य और अग्नि की पूजा करते थे कुछ ऐसी वस्तुएं मिली हैं जिन से ज्ञात होता है कि इस युग में अग्निशालाएं भी थी । कुछ मुहरों पर स्वास्तिक तथा चक्र का चिन्ह बना हुआ मिला है । जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु प्रदेश के निवासी सूर्य के उपासक थे ।लोथल और कालीबंगा में यज्ञ वेदिकाएं मिली है ।

अंधविश्वास : हडप्पा निवासी जादू-टोना भूत-प्रेत में भी विश्वास रखते थे । इन बुरी शक्तियों से बचने के लिए लोग जादू - टोने तथा ताबीजों का सहारा लेते थे ।उत्खनन में ताबीज भी बहुत बड़ी संख्या में मिले हैं ।धार्मिक दृष्टिकोण का आधार इहलौकिक तथा व्यावहारिक अधिक था । मूर्ति पूजा का आरंभ संभवत सिंधु सभ्यता से ही आरंभ हुआ प्रतीत होता है लोग भूत-प्रेत तंत्र मंत्र में भी विश्वास रखते थे ।

सिंधु सभ्यता  की  देन :-सिंधु सभ्यता आज से लगभग 5000 वर्ष पहले नष्ट हो गई है परंतु फिर भी आज हमारे जीवन के हर एक क्षेत्र में उस सभ्यता का प्रभाव देखने को मिलता है ।आर्य सभ्यता और हिंदू सभ्यता इससे काफी प्रभावित हुई है ।हमारे सामाजिक तथा आर्थिक जीवन पर इस सभ्यता का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है आज भी कुम्हार उसी तरह चाक पर बर्तन बनाते हैं ।पुरुष उसी ढंग के पोशाक पहनते हैं ।स्त्रियां उसी प्रकार गहनों का उपयोग करती हैं ।बच्चों के मनोरंजन के लिए तरह-तरह के खिलौने आज भी खेले जाते हैं । श्रृंगार -प्रसाधन की अनेक सामग्रियां जैसे काजल , उबटन आज भी स्त्रीयां प्रयोग करती हैं । धर्म पर भी उनका प्रभाव आज स्पष्ट परिलक्षित होता है । परवर्ती भारतीय कला भी सिंधु -सभ्यता की ऋणी है ।भारत में मूर्तिकला का शिलान्यास सिंधु सभ्यता में ही हुआ । "श्री दीक्षित " का मत है कि योगी की मूर्ति भारतीय मूर्तिकला का सर्वप्रथम उदाहरण है ।
सिंधु सभ्यता का अंत :- 1750 ई. पू. के आसपास हड़प्पा संस्कृति नष्ट हो गई । इस के विनाश का अनेक कारण विद्वानों ने दिया है कुछ विद्वानों के अनुसार सिन्धु  और रावी नदी की धारा में भयानक परिवर्तन के कारण आसपास का क्षेत्र सूखाग्रस्त हो गया ।इस वजह से सिंधु सभ्यता का अंत हो गया । एम . आर साहनी , राईक्स  का मत है कि विवर्तनिक हलचलों के कारण समुद्र का जल स्तर काफी ऊंचा उठ गया और संपूर्ण सिंधु प्रदेश जलमग्न हो गया ।  इस कारण यह  सभ्यता नष्ट हो गई । दूसरा मत यह है कि भूकंप के कारण या बाढ़ के कारण यह सभ्यता नष्ट हो गई । कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि भीषण अग्निकांड के कारण सभ्यता नष्ट हो गई होगी ।तो कुछ इतिहासकारों का मत है कि विदेशी एवं बर्बर जातियों के लगातार आक्रमण से यह सभ्यता नष्ट हो गई ।लेकिन इन कारणों से यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि सभी नगरों का अंत कैसे होगा क्योंकि बार और नदियों के सूखने का सब कुछ इलाकों में हुआ होगा ऐसा लगता है कि शासकों का नियंत्रण समाप्त हो गया जो भी हुआ हो परिवर्तन का असर बिल्कुल साफ दिखाई देता है आधुनिक पाकिस्तान के सिंध पंजाब के बस्तियां उजड़ गए कई लोग पूर्व और दक्षिण के इलाकों में नई और छोटी बस्तियों में जाकर बस गए ।इस प्रकार सिंधु सभ्यता का अंत हो गया ।
 सिंधु सभ्यता का अंत

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